श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.23.32 
ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चस्वी राजन्यो जगतीपति: ।
वैश्य: पठन् विट्पति: स्याच्छूद्र: सत्तमतामियात् ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई पृथु महाराज के गुणों को सुनता है तो वह ब्राह्मण हो तो ब्रह्मशक्ति में निपुण हो जाता है, क्षत्रिय हो तो संसार का सम्राट हो जाता है, वैश्य हो तो अन्य वैश्यों तथा अनेकों पशुओं का स्वामी हो जाता है और शूद्र हो तो वह श्रेष्ठ भक्त बन जाता है।
 
यदि कोई पृथु महाराज के गुणों को सुनता है तो वह ब्राह्मण हो तो ब्रह्मशक्ति में निपुण हो जाता है, क्षत्रिय हो तो संसार का सम्राट हो जाता है, वैश्य हो तो अन्य वैश्यों तथा अनेकों पशुओं का स्वामी हो जाता है और शूद्र हो तो वह श्रेष्ठ भक्त बन जाता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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