श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.23.31 
य इदं सुमहत्पुण्यं श्रद्धयावहित: पठेत् ।
श्रावयेच्छृणुयाद्वापि स पृथो: पदवीमियात् ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति राजा पृथु के महान गुणों का श्रद्धा और लगन से वर्णन करता है, चाहे वह उन्हें खुद पढ़े या सुने या दूसरों को सुनाने में मदद करे, वह निश्चित रूप से उसी लोक को प्राप्त करता है जिसे महाराज पृथु ने प्राप्त किया था। दूसरे शब्दों में, ऐसा व्यक्ति भी वैकुण्ठलोक में, भगवान के धाम में वापस चला जाता है।
 
A person who with devotion and attention reads the great qualities of King Prithu, or listens to them himself or narrates them to others, certainly attains the world of Maharaja Prithu. In other words, such a person also goes back to Vaikunthaloka, the abode of the Lord.
तात्पर्य
भक्ति सेवा के निष्पादन में, श्रवणं कीर्तनं विष्णोः विशेष रूप से बल दिया जाता है। इसका अर्थ है कि भक्ति, या भक्ति सेवा, विष्णु के बारे में सुनने और जप करने से शुरू होती है। जब हम विष्णु की बात करते हैं, तो हम उसका भी उल्लेख करते हैं जो विष्णु से संबंधित है। शिव पुराण में, भगवान शिव विष्णु पूजा को सर्वोच्च पूजा होने की सलाह देते हैं, और इससे बेहतर विष्णु पूजा वैष्णव की पूजा है या कुछ भी जो विष्णु से संबंधित है। यहाँ तथ्य यह बताया गया है कि वैष्णव के बारे में सुनना और जप करना विष्णु के बारे में सुनने और जप करने जितना ही अच्छा है, मैत्रेय ने समझाया है कि कोई भी जो पृथु महाराजा के बारे में ध्यान से सुनता है, वह वह ग्रह भी प्राप्त करता है जो महाराजा पृथु ने प्राप्त किया था। विष्णु और वैष्णव में कोई द्वैत नहीं है, और इसे अद्वय-ज्ञान कहा जाता है। एक वैष्णव विष्णु जितना ही महत्वपूर्ण है, और इसलिए श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अपने गुरु-अष्टक में लिखा है:

साक्षाद्-धरीतवेन समस्ता-शास्त्रैर

उक्तस्तथा भाव्यता एव साध्भिः

किन्तु प्रभोर यः प्रिय एव तस्य

वन्दे गुरोर श्री-चरणारविन्दम्

"आध्यात्मिक गुरु सर्वोच्च भगवान जितना ही सम्मानित होता है क्योंकि वह भगवान का सबसे गोपनीय सेवक होता है। इसे सभी प्रकट शास्त्रों में स्वीकार किया गया है और सभी अधिकारियों द्वारा इसका पालन किया जाता है। इसलिए मैं अपने आध्यात्मिक गुरु के चरण कमलों में अपना पूर्ण नमस्कार अर्पित करता हूँ, जो श्री हरि के प्रामाणिक प्रतिनिधि हैं।"

सर्वोच्च वैष्णव आध्यात्मिक गुरु है, और वह भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व से भिन्न नहीं है। यह कहा जाता है कि कभी-कभी भगवान चैतन्य महाप्रभु गोपियों के नामों का जाप करते थे। भगवान के कुछ छात्रों ने उन्हें इसके बजाय कृष्ण के नाम का जाप करने की सलाह देने की कोशिश की, लेकिन यह सुनकर चैतन्य महाप्रभु अपने छात्रों पर बहुत क्रोधित हो गए। इस विषय पर विवाद इस बिंदु पर पहुँच गया कि इस घटना के बाद चैतन्य महाप्रभु ने सन्यास लेने का फैसला किया क्योंकि उन्हें अपने गृहस्थाश्रम में बहुत गंभीरता से नहीं लिया गया था। बात यह है कि चूँकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोपियों के नामों का जाप किया था, इसलिए गोपियों या भगवान के भक्तों की पूजा उतनी ही अच्छी है जितनी सीधे भगवान को सेवा प्रदान की जाती है। भगवान द्वारा स्वयं भी कहा गया है कि उनके भक्तों की भक्ति सेवा उनको सीधे दी जाने वाली सेवा से बेहतर है। कभी-कभी भक्तों का सहजिया वर्ग केवल भक्तों की गतिविधियों को छोड़कर कृष्ण के व्यक्तिगत समय में रुचि रखता है। इस प्रकार का भक्त बहुत उच्च स्तर पर नहीं है; जो भक्त और भगवान को समान स्तर पर देखता है उसकी और प्रगति होती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)