इत्थम्भूतानुभावोऽसौ पृथु: स भगवत्तम: ।
कीर्तितं तस्य चरितमुद्दामचरितस्य ते ॥ ३० ॥
अनुवाद
मैत्रेय ने आगे कहा : भक्तों में महान् महाराज पृथु अत्यन्त शक्तिशाली थे और उनका चरित्र अत्यन्त उदार तथा उद्दाम था। मैंने जहाँ तक संभव था, तुमसे उसका वर्णन किया है।
Maitreya further said: The great Maharaja Prithu was very powerful among the devotees and his character was very generous and bountiful. I have described him to you as much as possible.
तात्पर्य
इस श्लोक में "भगवत्तामः" शब्द बहुत अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि भगवत् शब्द का प्रयोग विशेष रूप से भगवान श्री कृष्ण के लिए किया जाता है, इसी तरह जैसे 'भगवान' शब्द 'भगवत्' शब्द से आया है। हालाँकि, कभी-कभी हम देखते हैं कि भगवान शब्द का उपयोग महान व्यक्तित्वों जैसे भगवान ब्रह्मा, भगवान शिव और नारद मुनि के लिए किया जाता है। यहाँ भी पृथु महाराज को भगवतों में सर्वश्रेष्ठ या सभी देवताओं में सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। किसी भी व्यक्ति को इस तरह से तभी संबोधित किया जा सकता है जब वह एक महान व्यक्तित्व हो जो असाधारण और असामान्य विशेषताएं प्रदर्शित करता हो या जो अपने निधन के बाद सबसे महान लक्ष्य प्राप्त करता हो या जो ज्ञान और अज्ञान के बीच के अंतर को जानता हो। दूसरे शब्दों में, भगवान शब्द का उपयोग सामान्य व्यक्तियों के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥