श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  4.23.29 
मैत्रेय उवाच
स्तुवतीष्वमरस्त्रीषु पतिलोकं गता वधू: ।
यं वा आत्मविदां धुर्यो वैन्य: प्रापाच्युताश्रय: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा: हे विदुर, जब देवता पत्नियाँ परस्पर ऐसे संवाद कर रही थीं, तब तक रानी अर्चि ने उस लोक को प्राप्त कर लिया जहाँ उनके पति सर्वोच्च सद्गति को प्राप्त सर्वोत्कृष्ट स्वरूप वाले महाराज पृथु पहुँच चुके थे।
 
महर्षि मैत्रेय ने आगे कहा: हे विदुर, जब देवता पत्नियाँ परस्पर ऐसे संवाद कर रही थीं, तब तक रानी अर्चि ने उस लोक को प्राप्त कर लिया जहाँ उनके पति सर्वोच्च सद्गति को प्राप्त सर्वोत्कृष्ट स्वरूप वाले महाराज पृथु पहुँच चुके थे।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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