इस पद में नैष्कर्म्य शब्द का भी महत्वपूर्ण अर्थ है, जिसका अर्थ है "अनुभवजन्य ज्ञान।" जब तक कोई अनुभवजन्य ज्ञान के स्तर पर नहीं आता है और भगवान को भक्ति सेवा अर्पित नहीं करता है, तब तक वह पूर्ण नहीं होता है। सामान्यतः ज्ञान, योग और कर्म की प्रक्रियाएँ जीवन-दर-जीवन तब तक की जाती हैं जब तक कि भगवान को विशुद्ध भक्ति सेवा प्रदान करने का अवसर नहीं मिलता है। यह अवसर किसी शुद्ध भक्त की कृपा से दिया जाता है, और केवल इसी तरह कोई वास्तव में मुक्ति प्राप्त कर सकता है। इस वर्णन के संदर्भ में, देवताओं की पत्नियाँ पश्चाताप कर रही थीं क्योंकि हालाँकि उन्हें एक उच्च ग्रह-मंडल में जन्म लेने का अवसर मिला था, जहाँ जीवन लाखों वर्षों का होता है और सभी भौतिक सुख-सुविधाएँ उपलब्ध होती हैं, लेकिन वे पृथु महाराज और उनकी पत्नी जितनी भाग्यशाली नहीं थीं, जो वास्तव में उनसे श्रेष्ठ थे। दूसरे शब्दों में, पृथु महाराज और उनकी पत्नी ने उच्च ग्रह-मंडलों और यहाँ तक कि ब्रह्मलोक में पदोन्नति का तिरस्कार किया क्योंकि जिस पद को वे प्राप्त कर रहे थे वह अतुलनीय था। भगवद-गीता (8.16) में भगवान पुष्टि करते हैं, "आब्रह्म-भुवनाल लोकाः पुनर आर्तिनो अर्जुन:" "भौतिक दुनिया में सबसे ऊंचे ग्रह से लेकर सबसे नीचे तक, सभी दुख के स्थान हैं जहाँ बार-बार जन्म और मृत्यु होती है।" दूसरे शब्दों में, यदि कोई व्यक्ति उच्चतम ग्रह, ब्रह्मलोक में भी चला जाता है, तो उसे जन्म और मृत्यु के दुखों में वापस लौटना पड़ता है। भगवद-गीता के नौवें अध्याय (9.21) में भी भगवान कृष्ण कहते हैं:
ते तं भुकत्वा स्वर्ग-लोकम् विशालम्
क्षीणे पुण्ये मर्त्य-लोकम् विशन्ति
"इस प्रकार स्वर्गीय इंद्रिय सुख का भोग करने के बाद, वे फिर से इस नश्वर ग्रह पर लौट आते हैं।" इस प्रकार पवित्र क्रियाकलापों के परिणामों को समाप्त करने के बाद, मनुष्य को फिर से निम्न ग्रह-मंडलों में आना पड़ता है और पवित्र क्रियाकलापों का एक नया अध्याय शुरू करना पड़ता है। इसलिए श्रीमद्-भागवतम (1.5.12) में कहा गया है, नैष्कर्म्यम् अपि अच्युत-भाव-वर्जितम्: "मुक्ति का मार्ग बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है जब तक कि मनुष्य भगवान की भक्ति सेवा प्राप्त नहीं कर लेता है।" भले ही किसी को अवैयक्तिक ब्रह्मज्योति में पदोन्नत किया जाता है, लेकिन उसके पास इस भौतिक दुनिया में गिरने का पूरा मौका होता है। यदि ब्रह्मज्योति से गिरना संभव है, जो इस भौतिक दुनिया में उच्च ग्रह-मंडलों से परे है, तो उन सामान्य योगियों और कर्मियों के बारे में क्या कहा जा सकता है जिन्हें केवल उच्च भौतिक ग्रहों तक ही ऊँचा उठाया जा सकता है? इस प्रकार उच्च ग्रह-मंडलों के निवासियों की पत्नियों ने कर्म, ज्ञान और योग के परिणामों की बहुत सराहना नहीं की।
