देवों की पत्नियों ने आगे कहा: जरा देखो तो कि यह पतिव्रता महिला अर्चि अपने अविश्वसनीय पुण्य कर्मों के प्रभाव से अभी भी अपने पति का पीछा कर रही है और जहाँ तक हम देख सकते हैं, ऊपर की ओर जा रही है।
The wives of the gods continued: Just see how that chaste woman Archi, by the power of her inconceivable good deeds, is still following her husband upwards as far as we can see.
तात्पर्य
पृथु महाराज के हवाई जहाज़ और रानी अरसी के हवाई जहाज़ दोनों ही ऊँचे ग्रहों की स्त्रियों की दृष्टि से गुज़र चुके थे। इन स्त्रियों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हो रहा था कि पृथु महाराज और उनकी पत्नी इतने ऊँचे ओहदे को कैसे पा गए। यद्यपि वे ऊँचे ग्रहों में रहने वालों की पत्नियाँ थीं और पृथु महाराज एक नीच ग्रह (पृथ्वी) के निवासी थे, फिर भी राजा, अपनी पत्नी के साथ, देवताओं के क्षेत्रों से आगे निकल गए और वैकुण्ठलोक को चले गए। यहाँ शब्द ऊर्ध्वम्, "ऊपर" महत्वपूर्ण है, क्योंकि बोलने वाली स्त्रियाँ ऊँचे ग्रहों की थीं, जिसमें चंद्र, सूर्य और शुक्र, ब्रह्मलोक या सबसे ऊँचा ग्रह शामिल है। ब्रह्मलोक के परे आध्यात्मिक आकाश है, और उस आध्यात्मिक आकाश में असंख्य वैकुण्ठलोक हैं। इसलिए ऊर्ध्वम् शब्द बताता है कि वैकुण्ठ ग्रह इन भौतिक ग्रहों के परे या ऊपर हैं, और यही वैकुण्ठ ग्रह थे जहाँ पृथु महाराज और उनकी पत्नी जा रहे थे। यह भी इंगित करता है कि जब पृथु महाराज और उनकी पत्नी अरसी ने भौतिक आग में अपने भौतिक शरीर को त्याग दिया, तो उन्होंने तुरंत अपने आध्यात्मिक शरीर को विकसित किया और आध्यात्मिक हवाई जहाज़ में प्रवेश किया, जो भौतिक तत्वों में प्रवेश कर सकता था और आध्यात्मिक आकाश तक पहुँच सकता था। चूँकि उन्हें दो अलग-अलग हवाई जहाज़ों द्वारा ले जाया गया था, इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अंतिम संस्कार की चिता में जलने के बाद भी वे अलग-अलग, व्यक्तिगत व्यक्ति बने रहे। दूसरे शब्दों में, उन्होंने कभी भी अपनी पहचान नहीं खोई या शून्य नहीं हुए, जैसा कि अवैयक्तिकों द्वारा कल्पना की जाती है। ऊँचे ग्रहों की स्त्रियाँ ऊपर और नीचे दोनों देखने में सक्षम थीं। जब उन्होंने नीचे देखा, तो वे देख सकती थीं कि पृथु महाराज का शरीर जल रहा है और उनकी पत्नी अरसी आग में प्रवेश कर रही है, और जब उन्होंने ऊपर देखा, तो वे देख सकीं कि कैसे उन्हें दो हवाई जहाज़ों में वैकुण्ठलोक ले जाया जा रहा है। यह सब केवल दुरविभाव्येन कर्मणा, अकल्पनीय गतिविधि द्वारा ही संभव है। पृथु महाराज एक शुद्ध भक्त थे, और उनकी पत्नी, रानी अरसी, बस अपने पति का अनुसरण कर रही थीं। इस प्रकार उन्हें दोनों को शुद्ध भक्त माना जा सकता है, और इस प्रकार वे अकल्पनीय गतिविधियों को करने में सक्षम हैं। ऐसी गतिविधियाँ साधारण मनुष्यों के लिए संभव नहीं हैं। वास्तव में, साधारण मनुष्य भगवान की भक्ति सेवा में भी नहीं लग सकते हैं, और न ही साधारण स्त्रियाँ शुद्धता के ऐसे व्रतों को बनाए रख सकती हैं और अपने पति का हर प्रकार से अनुसरण कर सकती हैं। एक स्त्री को उच्च योग्यता प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन यदि वह बस अपने पति के पदचिन्हों पर चलती है, जो एक भक्त होना चाहिए, तो पति और पत्नी दोनों मोक्ष प्राप्त करते हैं और वैकुण्ठलोक में पदोन्नत होते हैं। यह महाराज पृथु और उनकी पत्नी की अकल्पनीय गतिविधियों से पता चलता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥