श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.23.25 
देव्य ऊचु:
अहो इयं वधूर्धन्या या चैवं भूभुजां पतिम् ।
सर्वात्मना पतिं भेजे यज्ञेशं श्रीर्वधूरिव ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
देवताओं की पत्नियाँ बोलीं : रानी अर्चि धन्य हैं! हम देख रही हैं कि समस्त राजाओं के सम्राट महाराज पृथु की ये रानी ऐश्वर्य की देवी लक्ष्मी ने जिस प्रकार भगवान विष्णु की सेवा की है, ठीक उसी प्रकार उन्होंने मन, वचन और कर्म से अपने पति की सेवा की है।
 
The wives of the demigods said: Blessed is Queen Archi! We see that this queen of King Prithu has served her husband with her mind, speech and body in the same manner as the goddess of wealth Lakshmi serves Lord Yajnesh or Vishnu.
तात्पर्य
इस श्लोक में यज्ञेशं श्रीर वधूर्य इव वाक्य से यह सूचित किया गया है कि महारानी अक्रि ने अपने पति की वैसे ही सेवा की जैसे लक्ष्मी जी भगवान विष्णु की। इस संसार के इतिहास में भी हम देख सकते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण जब द्वारका में राज्य कर रहे थे तो उनकी प्रमुख पटरानी रुक्मिणी जी के पास किंकरियों की सेवा के लिए सैकड़ों लड़कियाँ रहती थीं, फिर भी वे भगवान श्रीकृष्ण की व्यक्तिगत सेवा स्वयं करती थीं। वैकुण्ठ लोक में भी लक्ष्मी जी नारायण जी की साथ लाखों भक्त सेवा के लिए तत्पर रहते हुए भी स्वयं उनकी सेवा करती हैं। इसी तरह देवताओं की पटरानियाँ और पहले के मनुष्यों की पत्नियाँ भी यही प्रणाली मानती थीं। वैदिक सभ्यता में पति-पत्नी को तलाक जैसे मानवनिर्मित कानून से अलग नहीं किया जाता था। हमें मनुष्य समाज में पारिवारिक जीवन को बनाए रखने की आवश्यकता को समझना चाहिए और तलाक नामक कृत्रिम कानून को समाप्त करना चाहिए। पति-पत्नी को कृष्ण चैतन्य में रहकर लक्ष्मी-नारायण या कृष्ण-रुक्मिणी के पदचिन्हों पर चलना चाहिए। इससे संसार में शांति और सद्भाव की स्थापना हो सकती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)