अपने पति में सभी जीवन लक्षणों को बंद होता देख कर, रानी थोड़ी देर के लिए विलाप करती रही। ‘किञ्चित’ शब्द का अर्थ है “थोड़ी देर के लिए”। रानी को पूरी तरह पता था कि उसके पति की मृत्यु नहीं हुई है, हालाँकि जीवन के लक्षण - क्रियाएँ, बुद्धिमत्ता और इंद्रियानुभूति - बंद हो गए थे। जैसा कि भगवद-गीता (२.१३) में कहा गया है:
देहिनोऽस्मिन यथा देहे
कौमारं यौवनं जरा
तथा देहान्तर-प्राप्तिर्
धीरस्तत्र न मुह्यति
“ जैसे देहधारी शरीर में लगातार बाल्यावस्था से युवावस्था और फिर बुढ़ापे में जाता है, उसी प्रकार मृत्यु पर आत्मा दूसरे शरीर में चली जाती है। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा ऐसे परिवर्तन से विचलित नहीं होती है।"
जब एक जीव एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरित होता है, एक प्रक्रिया जिसे आमतौर पर मृत्यु के रूप में जाना जाता है, तो एक समझदार व्यक्ति विलाप नहीं करता, क्योंकि वह जानता है कि जीव मरा नहीं है बल्कि केवल एक शरीर से दूसरे शरीर में स्थानांतरित हुआ है। रानी को अपने पति के शरीर के साथ जंगल में अकेले रहने का डर होना चाहिए था, लेकिन चूँकि वह एक महान व्यक्तित्व की महान पत्नी थी, वह थोड़ी देर के लिए विलाप करती रही, लेकिन तुरंत समझ गई कि उसे कई कर्तव्यों का पालन करना है। इसलिए विलाप में अपना समय बर्बाद करने के बजाय, उसने तुरंत एक पहाड़ी की चोटी पर एक अग्नि-कुंड तैयार किया और फिर अपने पति के शरीर को जलाने के लिए उस पर रख दिया।
महाराज पृथु को यहाँ दयित के रूप में वर्णित किया गया है, क्योंकि वे न केवल पृथ्वी के राजा थे, बल्कि उन्होंने पृथ्वी को अपने संरक्षित बच्चे के रूप में भी माना। इसी तरह उन्होंने अपनी पत्नी की भी रक्षा की। राजा का कर्तव्य सभी को सुरक्षा प्रदान करना था, विशेष रूप से उस धरती या भूमि पर जिस पर वह शासन करता था, साथ ही नागरिकों और उसके परिवार के सदस्यों को भी। चूँकि पृथु महाराज एक परिपूर्ण राजा थे, इसलिए उन्होंने सभी को सुरक्षा प्रदान की, और इसलिए उन्हें यहाँ दयित के रूप में वर्णित किया गया है।
