श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  4.23.20 
अतीव भर्तुर्व्रतधर्मनिष्ठया
शुश्रूषया चार्षदेहयात्रया ।
नाविन्दतार्तिं परिकर्शितापि सा
प्रेयस्करस्पर्शनमाननिर्वृति: ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
हालाँकि महारानी अर्चि इस प्रकार के कष्टों की अभ्यस्त नहीं थीं, फिर भी वन में रहने की मर्यादाओं में उन्होंने ऋषियों की तरह अपने पति का साथ निभाया। वे ज़मीन पर सोती थीं और केवल फल, फूल और पत्तियाँ ही खाती थीं। चूँकि वे इन कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं थी, अतः वे क्षीण और दुबली-पतली हो गईं। फिर भी उन्हें अपने पति की सेवा करने से जो सुख मिलता था, उसके कारण उन्हें किसी कष्ट का एहसास नहीं होता था।
 
हालाँकि महारानी अर्चि इस प्रकार के कष्टों की अभ्यस्त नहीं थीं, फिर भी वन में रहने की मर्यादाओं में उन्होंने ऋषियों की तरह अपने पति का साथ निभाया। वे ज़मीन पर सोती थीं और केवल फल, फूल और पत्तियाँ ही खाती थीं। चूँकि वे इन कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं थी, अतः वे क्षीण और दुबली-पतली हो गईं। फिर भी उन्हें अपने पति की सेवा करने से जो सुख मिलता था, उसके कारण उन्हें किसी कष्ट का एहसास नहीं होता था।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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