|
| |
| |
श्लोक 4.23.18  |
तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् ।
तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान् ।
ज्ञानवैराग्यवीर्येण स्वरूपस्थोऽजहात्प्रभु: ॥ १८ ॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| तब पृथु महाराज ने जीवात्मा की सम्पूर्ण उपाधि माया के परम नियन्ता को अर्पित कर दी। ज्ञान तथा वैराग्य और भक्ति की आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा वे जीवात्मा की उन समस्त उपाधियों से मुक्त हो गये जिनसे वे घिरे हुए थे। इस प्रकार कृष्ण भावना की अपनी मूल सांविधानिक स्थिति में रहकर उन्होंने प्रभु या इन्द्रियों के नियन्ता के रूप में अपना शरीर त्याग दिया। |
| |
| तब पृथु महाराज ने जीवात्मा की सम्पूर्ण उपाधि माया के परम नियन्ता को अर्पित कर दी। ज्ञान तथा वैराग्य और भक्ति की आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा वे जीवात्मा की उन समस्त उपाधियों से मुक्त हो गये जिनसे वे घिरे हुए थे। इस प्रकार कृष्ण भावना की अपनी मूल सांविधानिक स्थिति में रहकर उन्होंने प्रभु या इन्द्रियों के नियन्ता के रूप में अपना शरीर त्याग दिया। |
| ✨ ai-generated |
| |
|