श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  4.23.16 
खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागश: ।
क्षितिमम्भसि तत्तेजस्यदो वायौ नभस्यमुम् ॥ १६ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार पृथु महाराज ने अपने शरीर के विभिन्न अंगों की भिन्न-भिन्न स्थितियों के अनुसार अपनी इंद्रियों के छिद्रों को आकाश में, रक्त और विभिन्न स्रावों जैसे शरीर के तरल पदार्थों को जल की समष्टि में, पृथ्वी को जल में, उसके बाद जल को अग्नि में, अग्नि को वायु में, वायु को आकाश में मिला दिया।
 
Thus, King Prithu merged the holes of his senses into the sky, the fluids of his body, such as blood and various secretions, into the universal water, the earth into water, then water into fire, fire into air, and air into sky.
तात्पर्य
इस श्लोक में दो शब्द बेहद महत्वपूर्ण हैं: यथा-स्थानं विभागशः। श्रीमद् भागवतम के द्वितीय स्कंध, पाँचवें अध्याय में, भगवान ब्रह्मा ने नारद को स्पष्ट रूप से समझाया था कि किस तरह सृष्टि की रचना हुई, और उन्होंने क्रमवार रूप से सभी इन्द्रियों के उचित विभागों, इन्द्रियों के नियंत्रक, इन्द्रियों की वस्तुओं और भौतिक तत्वों को समझाया था, और उन्होंने यह भी समझाया था कि किस प्रकार इन सबकी रचना एक-एक करके की गई: आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, आदि। इस सृष्टि में होने वाली प्रक्रिया को अच्छी तरह से समझना जरूरी है। ठीक इसी तरह, यह शरीर भी परमेश्वर द्वारा उसी प्रक्रिया के अनुसार ही रचा गया है। भगवान के व्यक्तित्व ने ब्रह्मांड में प्रवेश करने के बाद, ब्रह्मांड की रचना की एक-एक करके की। इसी तरह, एक माँ के गर्भ में प्रवेश करने के बाद, एक जीवित इकाई भी अपने स्थूल और सूक्ष्म शरीरों का निर्माण करती है, और उनके लिए आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी की समग्रता से अवयव लेती है। यथा-स्थानं विभागशः शब्दों से यह संकेत मिलता है कि किसी को सृष्टि की प्रक्रिया को समझना चाहिए और सृजनात्मक प्रक्रिया को उल्टा करके ध्यान करना चाहिए और इस तरह भौतिक दूषण से मुक्त होना चाहिए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)