श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.23.15 
उत्सर्पयंस्तु तं मूर्ध्नि क्रमेणावेश्य नि:स्पृह: ।
वायुं वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत् ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार पृथु महाराज ने धीरे-धीरे अपने प्राणवायु को मस्तक के ऊपर स्थित ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचाया, जिससे उनकी समस्त सांसारिक आकांक्षाएँ समाप्त हो गईं। उन्होंने धीरे-धीरे अपने प्राण वायु को परम वायु में, अपने शरीर को परम पृथ्वी में और अपने शरीर की अग्नि (तेज) को परम अग्नि में विलीन कर दिया।
 
In this way, Prithu Maharaj slowly took his life breath up to the Brahmarandhra, due to which all his worldly desires ended. He slowly merged his life breath into the universal air, his body into the universal earth and the fire (tej) of his body into the universal fire.
तात्पर्य
जब आध्यात्मिक चिंगारी, जिसे बाल के सिरे के दस हजारवें भाग के समान वर्णित किया गया है, को भौतिक अस्तित्व में बांधा जाता है, तो वह चिंगारी स्थूल और सूक्ष्म भौतिक तत्वों से ढक जाती है। भौतिक शरीर पाँच स्थूल तत्वों - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश - और तीन सूक्ष्म तत्वों - मन, बुद्धि और अहंकार से बना है। जब कोई मुक्ति प्राप्त करता है, तो वह इन भौतिक आवरणों से मुक्त हो जाता है। वास्तव में, योग में सफलता इन भौतिक आवरणों से मुक्त होकर आध्यात्मिक अस्तित्व में प्रवेश करने में निहित है। भगवान बुद्ध की निर्वाण की शिक्षाएँ इसी सिद्धांत पर आधारित हैं। भगवान बुद्ध ने अपने अनुयायियों को ध्यान और योग के माध्यम से इन भौतिक आवरणों को त्यागने का निर्देश दिया। भगवान बुद्ध ने आत्मा के बारे में कोई जानकारी नहीं दी, लेकिन अगर कोई उनके निर्देशों का सख्ती से पालन करता है, तो वह अंततः भौतिक आवरणों से मुक्त हो जाएगा और निर्वाण प्राप्त कर लेगा।

जब कोई जीवित इकाई भौतिक आवरणों को त्याग देती है, तो वह एक आत्मा रह जाती है। यह आत्मा ब्रह्म तेज में विलीन होने के लिए आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करनी चाहिए। दुर्भाग्य से, जब तक जीवित इकाई को आध्यात्मिक दुनिया और वैकुंठों की जानकारी नहीं होती है, तब तक उसके भौतिक अस्तित्व में फिर से गिरने की 99.9 प्रतिशत संभावना रहती है। हालाँकि, ब्रह्म तेज या ब्रह्मज्योति से आध्यात्मिक ग्रह में प्रोन्नत होने की थोड़ी संभावना है। इस ब्रह्मज्योति को अवैयक्तिकवादी विविधता के बिना मानते हैं, और बौद्ध इसे शून्य मानते हैं। किसी भी मामले में, चाहे कोई आध्यात्मिक आकाश को विविधता के बिना या शून्य के रूप में स्वीकार करता हो, आध्यात्मिक ग्रहों, वैकुंठों या कृष्णलोक में आनंद लिया जाने वाला कोई भी आध्यात्मिक आनंद नहीं है। आनंद की किस्मों की अनुपस्थिति में, आत्मा धीरे-धीरे आनंद का जीवन जीने के लिए आकर्षण महसूस करती है, और कृष्णलोक या वैकुंठलोक की कोई जानकारी नहीं होने के कारण, वह भौतिक किस्मों का आनंद लेने के लिए स्वाभाविक रूप से भौतिक गतिविधियों में गिर जाती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)