श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.23.14 
सम्पीड्य पायुं पार्ष्णिभ्यां वायुमुत्सारयञ्छनै: ।
नाभ्यां कोष्ठेष्ववस्थाप्य हृदुर:कण्ठशीर्षणि ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
जब महाराज पृथु ने विशेष यौगिक आसन साधा तो उन्होंने अपने गुदा द्वार को एड़ियों से बंद कर लिया और दोनों एड़ियों को दबाया, फिर धीरे-धीरे प्राण वायु को नाभि चक्र से होते हुए हृदय तथा कंठ तक ऊपर की ओर ले गए और अंत में उसे दोनों भौहों के बीच में स्थित स्थान तक पहुँचा दिया।
 
When Maharaja Prithu mastered a special yogic posture, he closed his anus with his heels and pressed both the heels, then slowly he took the vital air upward through the navel chakra to the heart and throat and finally took it between the eyebrows.
तात्पर्य
यहाँ बताए बैठने के आसन को मुक्तासन कहा जाता है। योग की प्रक्रिया में, सोने, खाने और प्रजनन संबंधी सख्त अनुशासनात्मक सिद्धांतों का पालन करने के बाद, उसे भिन्न-भिन्न बैठने के आसन का अभ्यास करने की अनुमति मिलती है। योग का अंतिम लक्ष्य व्यक्ति को अपनी मर्जी से शरीर त्यागने में सक्षम बनाना है। जिसने योगाभ्यास की अंतिम सीमा प्राप्त कर ली है, वह जब तक चाहे शरीर में रह सकता है या जब तक वह पूरी तरह परिपूर्ण न हो जाए, ब्रह्मांड के अंदर या बाहर कहीं भी जाने के लिए शरीर छोड़ सकता है। कुछ योगी शरीर छोड़कर ऊपरी ग्रह तंत्रों में जाते हैं और वहाँ की भौतिक सुविधाओं का आनंद लेते हैं। हालाँकि, बुद्धिमान योगी इस भौतिक दुनिया में अपना समय बिल्कुल भी बर्बाद नहीं करना चाहते; वे ऊपरी ग्रह तंत्रों की भौतिक सुविधाओं की परवाह नहीं करते, बल्कि सीधे आध्यात्मिक आकाश में, अपने घर वापस, भगवान के पास जाने में रुचि रखते हैं।

इस छंद के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि महाराजा पृथु की ऊपरी ग्रह तंत्रों में स्वयं को बढ़ावा देने की कोई इच्छा नहीं थी। वह तुरंत घर लौटना चाहते थे, भगवान के पास वापस। हालाँकि महाराजा पृथु ने कृष्ण चेतना प्राप्त करने के बाद रहस्यवादी योग का सारा अभ्यास बंद कर दिया था, पर उन्होंने अपने पिछले अभ्यास का लाभ उठाया और भगवान के पास जल्दी से लौटने के लिए तुरंत खुद को ब्रह्म-भूत मंच पर रखा। आसन के इस विशेष तंत्र का उद्देश्य, जिसे मुक्ति के लिए बैठने का आसन या मुक्तासन कहा जाता है, कुंडलिनी-चक्र में सफलता प्राप्त करना और जीवन को धीरे-धीरे मूलाधार-चक्र से स्वाधिष्ठान-चक्र, फिर मणिपूर-चक्र, अनाहत-चक्र, विशुद्ध-चक्र और अंत में आज्ञा-चक्र में उठाना है। जब योगी आज्ञा-चक्र तक पहुँच जाता है, जो दो आँखों के बीच होता है, तो वह ब्रह्मरंध्र, या अपनी खोपड़ी के छिद्र में प्रवेश करने में सक्षम हो जाता है, और वैकुंठ के आध्यात्मिक राज्य या कृष्णलोक तक, किसी भी ग्रह पर जा सकता है। निष्कर्ष यह है कि भगवान के पास वापस जाने के लिए व्यक्ति को ब्रह्म-भूत स्तर पर आना होगा। हालाँकि, जो कृष्ण चेतना में हैं या जो भक्ति-योग (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनं) का अभ्यास कर रहे हैं, वे मुक्तासन प्रक्रिया का अभ्यास किए बिना भी भगवान के पास लौट सकते हैं। मुक्तासन अभ्यास का उद्देश्य ब्रह्म-भूत स्तर तक आना है, क्योंकि ब्रह्म-भूत स्तर पर आए बिना व्यक्ति आध्यात्मिक आकाश में पदोन्नत नहीं हो सकता है। जैसा कि भगवद्-गीता (14.26) में कहा गया है:

माँ च योव्यभिचारेण

भक्ति-योगेन सेवते

स गुणान समतीत्यैतान

ब्रह्म-भूयाय कल्पते

भक्ति-योगी, भक्ति-योग का अभ्यास करते हुए, हमेशा ब्रह्म-भूत स्तर (ब्रह्म-भूयाय कल्पते) पर स्थित रहता है। यदि कोई भक्त ब्रह्म-भूत मंच पर बना रहने में सक्षम है, तो वह मृत्यु के बाद स्वतः ही आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश करता है और भगवान के पास लौट जाता है। इसलिए एक भक्त को कुंडलिनी-चक्र का अभ्यास न करने या एक के बाद एक छह चक्रों को भेदने के लिए दुखी होने की आवश्यकता नहीं है। जहाँ तक महाराजा पृथु का सवाल है, उन्होंने पहले से ही इस प्रक्रिया का अभ्यास किया था, और चूँकि वह उस समय का इंतजार नहीं करना चाहते थे जब उनकी मृत्यु स्वाभाविक रूप से होगी, उन्होंने षट-चक्र भेदन प्रक्रिया का लाभ उठाया और इस प्रकार अपनी मर्जी से शरीर त्याग दिया और तुरंत आध्यात्मिक आकाश में प्रवेश किया।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)