श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  4.23.13 
एवं स वीरप्रवर: संयोज्यात्मानमात्मनि ।
ब्रह्मभूतो द‍ृढं काले तत्याज स्वं कलेवरम् ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
समय आने पर जब पृथु महाराज को अपना शरीर त्यागना पड़ा, उन्होंने अपने मन को दृढ़तापूर्वक श्रीकृष्ण के चरणों में स्थिर कर लिया। इस प्रकार, ब्रह्म-भूत अवस्था में स्थित होकर उन्होंने भौतिक शरीर छोड़ दिया।
 
When the time came for Prithu Maharaj to give up his body, he fixed his mind firmly on the lotus feet of Sri Krishna and, thus situated in the brahmabhuta state, he gave up his physical body.
तात्पर्य
एक बंगाली कहावत के अनुसार, जीवन में जो भी आध्यात्मिक प्रगति करता है उसकी मृत्यु के समय पर ही परिक्षा होगी। भगवद्-गीता (8.6) में भी पुष्टि की गई है: यँ यं वापि स्मरणं भावं त्याजति अन्ते कालेवरम्/ तं तम वैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः। जो कृष्ण चेतना का अभ्यास करते हैं, वे जानते हैं कि उनकी परीक्षा मृत्यु के समय ही होगी। यदि कोई मृत्यु के समय कृष्ण को स्मरण करके जा सकता है, तो उसको तत्काल गोलोक वृंदावन या कृष्णलोक स्थानांतरित कर दिया जाता है और इस तरह उसका जीवन सफल हो जाता है। पृथु महाराज कृष्ण की कृपा से समझ गए कि उनके जीवन का अंत निकट है, और इस प्रकार वह अत्यंत आनंदित हुए और योग प्रक्रिया का अभ्यास करके पूरी तरह से ब्रह्म-भूत अवस्था पर शरीर का त्याग करने के लिए आगे बढ़े। निम्नलिखित श्लोकों में यह अच्छी तरह से वर्णित है कि कोई इस शरीर को स्वेच्छा से कैसे त्याग सकता है और वापस ईश्वर के घर लौट सकता है। पृथु महाराज द्वारा मृत्यु के समय प्रैक्टिस की गई योग प्रक्रिया इस शरीर के त्याग को गति देती है जबकि व्यक्ति शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ है। प्रत्येक भक्त शरीर का त्याग करना चाहता है जबकि वह शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ हो। यह इच्छा राजा कुलशेखर ने अपने मुकुंद-माला-स्तोत्र में भी व्यक्त की थी:

कृष्ण त्वदीय-पदपंकज-पंजरान्तम

अद्यैव मे विशतु मानस-राज-हंसः

प्राण पयाण-समये कफ-वात-पित्तैः

कण्ठावरोधना-विधौ स्मरणं कुतः ते

राजा कुलशेखर स्वस्थ अवस्था में अपना शरीर छोड़ना चाहते थे, और इस तरह उन्होंने कृष्ण से प्रार्थना की कि वह उन्हें तुरंत मरने दें जब वह अच्छे स्वास्थ्य में थे और जब उनका मन स्वस्थ था। जब कोई मनुष्य मरता है, तो वह आमतौर पर म्यूकस और पित्त से अभिभूत हो जाता है, और इस तरह वह घुट जाता है। चूँकि घुटन के दौरान किसी भी ध्वनि को कंपन करना बहुत मुश्किल है, तो यह सिर्फ कृष्ण की कृपा से है कि कोई मृत्यु के समय हरे कृष्ण का जाप कर सकता है। हालाँकि, मुक्तासन स्थिति में खुद को स्थापित करने से, एक योगी तुरंत अपने शरीर को छोड़ सकता है और वह जिस ग्रह पर चाहे जा सकता है। एक संपूर्ण योगी योग के अभ्यास के माध्यम से जब चाहे अपने शरीर को छोड़ सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)