अन्याभिलाषिता-शुन्यं
ज्ञान-कर्माद्य-अनावृतम्
अनुकूल्येन कृष्णानु-
शीलनं भक्तिर उत्तमा
जब कोई व्यक्ति जो भौतिक इच्छाओं से प्रेरित नहीं होता है और फलदायी गतिविधि और अनुभवजन्य अटकलों की प्रक्रियाओं से दूषित नहीं होता है, वह स्वामी की अनुकूल सेवा में पूरी तरह से संलग्न हो जाता है, तो उसकी सेवा को भगवद्-धर्म या शुद्ध भक्ति सेवा कहा जाता है। इस श्लोक में ब्रह्मणि शब्द अवैयक्तिक ब्रह्म को संदर्भित नहीं करता है। अवैयक्तिक ब्रह्म भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व की एक अधीनस्थ विशेषता है, और चूंकि अवैयक्तिक ब्रह्म उपासक ब्रह्म तेज में विलय होने की इच्छा रखते हैं, उन्हें भगवद्-धर्म के अनुयायी नहीं माना जा सकता है। भौतिक सुख भोग में बाधा डालने के बाद, अवैयक्तिकवादी स्वामी के अस्तित्व में विलीन होने की इच्छा कर सकते हैं, लेकिन स्वामी के एक शुद्ध भक्त की ऐसी कोई इच्छा नहीं होती है। इसलिए एक शुद्ध भक्त वास्तव में भगवद्-धर्मी होता है।
इस श्लोक से यह स्पष्ट है कि महाराजा पृथु कभी भी अवैयक्तिक ब्रह्म के उपासक नहीं थे, लेकिन हर समय भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के शुद्ध भक्त थे। भगवती ब्रह्मणि उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो भगवान के व्यक्तित्व के लिए भक्ति सेवा में संलग्न है। अवैयक्तिक ब्रह्म के बारे में एक भक्त का ज्ञान अपने आप प्रकट हो जाता है, और वह अवैयक्तिक ब्रह्म में विलीन होने में कोई दिलचस्पी नहीं रखता है। भक्ति सेवा में महाराजा पृथु की गतिविधियों ने उन्हें भक्ति गतिविधियों के निर्वहन में स्थिर और स्थिर रहने में सक्षम बनाया, बिना कर्म, ज्ञान या योग का सहारा लिए।
