चूंकि राजा वेन के शासनकाल के दौरान बहुत सी विसंगतियाँ थीं, इसलिए भगवान ने अपने सबसे विश्वासपात्र भक्त महाराज पृथु को चीजों को व्यवस्थित करने के लिए भेजा। इसलिए, भगवान के आदेशों का पालन करने और दुनिया के मामलों को सुलझाने के बाद, महाराज पृथु सेवानिवृत्त होने के लिए तैयार हो गए। वह अपने सरकारी प्रशासन में अनुकरणीय रहे थे और अब उन्हें अपनी सेवानिवृत्ति में अनुकरणीय बनना था। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति अपने पुत्रों के बीच विभाजित कर दी और उन्हें दुनिया पर शासन करने के लिए नियुक्त किया और फिर वह अपनी पत्नी के साथ जंगल चले गए। इस संबंध में यह महत्वपूर्ण है कि कहा जाता है कि महाराज पृथु अकेले सेवानिवृत्त हुए और उसी समय उन्होंने अपनी पत्नी को अपने साथ ले गए। वैदिक सिद्धांतों के अनुसार, पारिवारिक जीवन से सेवानिवृत्त होने पर कोई अपनी पत्नी को अपने साथ ले जा सकता है, क्योंकि पति और पत्नी को एक इकाई माना जाता है। इस प्रकार वे दोनों मिलकर मुक्ति के लिए तपस्या कर सकते हैं। यही वह मार्ग है जिसका अनुसरण महाराज पृथु ने किया, जो एक अनुकरणीय चरित्र थे, और यही वैदिक सभ्यता का तरीका भी है। व्यक्ति को केवल मृत्यु के समय तक घर पर नहीं रहना चाहिए, बल्कि समय पर पारिवारिक जीवन से अलग हो जाना चाहिए और भगवान के पास वापस जाने के लिए खुद को तैयार करना चाहिए। भगवान के शक्त्यावेश अवतार के रूप में जो वास्तव में कृष्ण के प्रतिनिधि के रूप में वैकुंठ से आए थे, महाराज पृथु निश्चित रूप से भगवान के पास वापस जाने वाले थे। फिर भी, सभी तरह से उदाहरण स्थापित करने के लिए, उन्होंने तपो-वन में भी कड़ी तपस्या की। ऐसा प्रतीत होता है कि उन दिनों कई तपो-वन या वन थे जो विशेष रूप से सेवानिवृत्ति और तपस्या के अभ्यास के लिए थे। दरअसल, भगवान के परम व्यक्तित्व की शरण को पूरी तरह से स्वीकार करने के लिए प्रत्येक के लिए तपो-वन में जाना अनिवार्य था, क्योंकि पारिवारिक जीवन से सेवानिवृत्त होना बहुत कठिन है और साथ ही घर पर भी रहना है।
