श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 23: महाराज पृथु का भगवद्धाम गमन  »  श्लोक 1-3
 
 
श्लोक  4.23.1-3 
मैत्रेय उवाच
दृष्ट्वात्मानं प्रवयसमेकदा वैन्य आत्मवान् ।
आत्मना वर्धिताशेषस्वानुसर्ग: प्रजापति: ॥ १ ॥
जगतस्तस्थुषश्चापि वृत्तिदो धर्मभृत्सताम् ।
निष्पादितेश्वरादेशो यदर्थमिह जज्ञिवान् ॥ २ ॥
आत्मजेष्वात्मजां न्यस्य विरहाद्रुदतीमिव ।
प्रजासु विमन:स्वेक: सदारोऽगात्तपोवनम् ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
अपने जीवन के अंतिम चरण में, महाराजा पृथु को जब लगा कि मैं वृद्ध हो चुका हूँ तब उस महापुरुष ने जो संसार का राजा था, अपने द्वारा अर्जित जड़ से लेकर चल सभि तरह के जीवों में बांट दिया। उन्होंने सभी लोगों के लिए धार्मिक नियमों के अनुसार आजीविका की व्यवस्था की और भगवान के निर्देशों का पालन करके, उनकी पूर्ण सहमति से उन्होंने अपने पुत्रों को अपनी पुत्री स्वरूपा पृथ्वी को सौंप दिया। उसके बाद महाराजा पृथु अपनी प्रजा को जो राजा की वियोग के मरम् से कराह रही थी छोड़कर तपस्या करने के लिए पत्नी समेत अकेले वन चले गए।
 
In the last stage of his life, when Maharaja Prithu saw that he was getting old, that great man, who was the king of the world, distributed all the wealth he had accumulated among the living and non-living beings. He arranged for a livelihood (pension) for each person according to religious rules and by following the orders of the Lord, with his full consent, he handed over his sons to his daughter, the earth. Then Maharaja Prithu left his subjects, who were weeping due to the separation from the king, and went alone to the forest with his wife to do penance.
तात्पर्य
महाराज पृथु भगवान के शक्त्यावेश अवतारों में से एक थे और वह पृथ्वी पर परमेश्वर के आदेशों का पालन करने के लिए आए थे। जैसा कि भगवद गीता में कहा गया है, सर्वोच्च भगवान सभी ग्रहों के स्वामी हैं और वह हमेशा यह देखने के लिए उत्सुक रहते हैं कि प्रत्येक ग्रह पर जीव सुखपूर्वक रह रहे हैं और अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं। जैसे ही कर्तव्यों के निष्पादन में कोई विसंगति आती है, भगवान पृथ्वी पर प्रकट होते हैं, जैसा कि भगवद गीता (4.7) में पुष्टि की गई है: यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

चूंकि राजा वेन के शासनकाल के दौरान बहुत सी विसंगतियाँ थीं, इसलिए भगवान ने अपने सबसे विश्वासपात्र भक्त महाराज पृथु को चीजों को व्यवस्थित करने के लिए भेजा। इसलिए, भगवान के आदेशों का पालन करने और दुनिया के मामलों को सुलझाने के बाद, महाराज पृथु सेवानिवृत्त होने के लिए तैयार हो गए। वह अपने सरकारी प्रशासन में अनुकरणीय रहे थे और अब उन्हें अपनी सेवानिवृत्ति में अनुकरणीय बनना था। उन्होंने अपनी सारी संपत्ति अपने पुत्रों के बीच विभाजित कर दी और उन्हें दुनिया पर शासन करने के लिए नियुक्त किया और फिर वह अपनी पत्नी के साथ जंगल चले गए। इस संबंध में यह महत्वपूर्ण है कि कहा जाता है कि महाराज पृथु अकेले सेवानिवृत्त हुए और उसी समय उन्होंने अपनी पत्नी को अपने साथ ले गए। वैदिक सिद्धांतों के अनुसार, पारिवारिक जीवन से सेवानिवृत्त होने पर कोई अपनी पत्नी को अपने साथ ले जा सकता है, क्योंकि पति और पत्नी को एक इकाई माना जाता है। इस प्रकार वे दोनों मिलकर मुक्ति के लिए तपस्या कर सकते हैं। यही वह मार्ग है जिसका अनुसरण महाराज पृथु ने किया, जो एक अनुकरणीय चरित्र थे, और यही वैदिक सभ्यता का तरीका भी है। व्यक्ति को केवल मृत्यु के समय तक घर पर नहीं रहना चाहिए, बल्कि समय पर पारिवारिक जीवन से अलग हो जाना चाहिए और भगवान के पास वापस जाने के लिए खुद को तैयार करना चाहिए। भगवान के शक्त्यावेश अवतार के रूप में जो वास्तव में कृष्ण के प्रतिनिधि के रूप में वैकुंठ से आए थे, महाराज पृथु निश्चित रूप से भगवान के पास वापस जाने वाले थे। फिर भी, सभी तरह से उदाहरण स्थापित करने के लिए, उन्होंने तपो-वन में भी कड़ी तपस्या की। ऐसा प्रतीत होता है कि उन दिनों कई तपो-वन या वन थे जो विशेष रूप से सेवानिवृत्ति और तपस्या के अभ्यास के लिए थे। दरअसल, भगवान के परम व्यक्तित्व की शरण को पूरी तरह से स्वीकार करने के लिए प्रत्येक के लिए तपो-वन में जाना अनिवार्य था, क्योंकि पारिवारिक जीवन से सेवानिवृत्त होना बहुत कठिन है और साथ ही घर पर भी रहना है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)