मैत्रेय उवाच
स एवं ब्रह्मपुत्रेण कुमारेणात्ममेधसा ।
दर्शितात्मगति: सम्यक्प्रशस्योवाच तं नृप: ॥ ४१ ॥
अनुवाद
मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा: इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान में पूर्ण ब्रह्मा के पुत्र कुमारों में से एक द्वारा पूर्ण रूप से प्रबुद्ध होकर राजा ने निम्नलिखित शब्दों में उनकी पूजा की।
Sage Maitreya continued: Thus having attained full Self-knowledge through one of the Kumaras, the sons of Brahmā, who was fully Self-knowledged, the king worshipped him with the following words.
तात्पर्य
इस श्लोक में सर्वश्रीपाद विश्वनाथचक्रवर्ती ठाकुर ने 'आत्म-मेधसा' शब्द पर टीका करते हुए कहा है कि 'आत्मनि' का मतलब है भगवान कृष्ण, परमात्मनि। भगवान कृष्ण परमात्मा हैं : 'ईश्वरः परमः कृष्णः' (ब्रह्म-संहिता, 15.1)। इसलिए जिसका मन कृष्ण-भक्ति में पूरी तरह लगा हो, उसे 'आत्म-मेधा' कहते हैं। इसकी तुलना ' गृह-मेधी' शब्द से की जा सकती है जो उस व्यक्ति को बताता है जिसका दिमाग हमेशा भौतिक गतिविधियों के विचारों में लिपटा रहता है। 'आत्म-मेधा' हमेशा कृष्ण-भक्ति में भगवान कृष्ण की गतिविधियों के बारे में सोचता है। चूँकि सनत-कुमार, जो भगवान ब्रह्मा के पुत्र थे, पूरी तरह से कृष्ण-भक्त थे, इसलिए वो आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग बता सकते थे। 'आत्म-गति' शब्द कार्य की उस पद्धति को बताता है कि जिसके द्वारा कोई कृष्ण को समझने में प्रगति कर सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥