श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 22: चारों कुमारों से पृथु महाराज की भेंट  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  4.22.41 
मैत्रेय उवाच
स एवं ब्रह्मपुत्रेण कुमारेणात्ममेधसा ।
दर्शितात्मगति: सम्यक्प्रशस्योवाच तं नृप: ॥ ४१ ॥
 
 
अनुवाद
मैत्रेय ऋषि ने आगे कहा: इस प्रकार आध्यात्मिक ज्ञान में पूर्ण ब्रह्मा के पुत्र कुमारों में से एक द्वारा पूर्ण रूप से प्रबुद्ध होकर राजा ने निम्नलिखित शब्दों में उनकी पूजा की।
 
Sage Maitreya continued: Thus having attained full Self-knowledge through one of the Kumaras, the sons of Brahmā, who was fully Self-knowledged, the king worshipped him with the following words.
तात्पर्य
इस श्लोक में सर्वश्रीपाद विश्वनाथचक्रवर्ती ठाकुर ने 'आत्म-मेधसा' शब्द पर टीका करते हुए कहा है कि 'आत्मनि' का मतलब है भगवान कृष्ण, परमात्मनि। भगवान कृष्ण परमात्मा हैं : 'ईश्वरः परमः कृष्णः' (ब्रह्म-संहिता, 15.1)। इसलिए जिसका मन कृष्ण-भक्ति में पूरी तरह लगा हो, उसे 'आत्म-मेधा' कहते हैं। इसकी तुलना ' गृह-मेधी' शब्द से की जा सकती है जो उस व्यक्ति को बताता है जिसका दिमाग हमेशा भौतिक गतिविधियों के विचारों में लिपटा रहता है। 'आत्म-मेधा' हमेशा कृष्ण-भक्ति में भगवान कृष्ण की गतिविधियों के बारे में सोचता है। चूँकि सनत-कुमार, जो भगवान ब्रह्मा के पुत्र थे, पूरी तरह से कृष्ण-भक्त थे, इसलिए वो आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग बता सकते थे। 'आत्म-गति' शब्द कार्य की उस पद्धति को बताता है कि जिसके द्वारा कोई कृष्ण को समझने में प्रगति कर सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)