सनत्कुमार उवाच
साधु पृष्टं महाराज सर्वभूतहितात्मना ।
भवता विदुषा चापि साधूनां मतिरीदृशी ॥ १८ ॥
अनुवाद
सनत्कुमार बोले : हे राजा पृथु, आपने मुझसे अति सुन्दर प्रश्न पूछा है। इस प्रकार के प्रश्न विशेष रूप से आप जैसे परोपकारी व्यक्ति द्वारा पूछे जाने पर समस्त जीवों के लिए अत्यन्त लाभकारी होते हैं। यद्यपि आप सब कुछ जानते हैं, किंतु आप ऐसे प्रश्न इसलिए पूछ रहे हैं क्योंकि यह साधु पुरुषों का आचरण है। ऐसी बुद्धि होना सर्वथा आपकी गरिमा के अनुरूप है।
Sanatkumara said: O King Prithu, you have asked me a very good question. Such questions, especially when asked by a benefactor like you, are extremely beneficial to all living entities. Although you know everything, you are asking such questions because this is the conduct of saintly persons. Such wisdom is completely in accordance with you.
तात्पर्य
महाराज पृथु आध्यात्मिक विद्या से भली-भाँति परिचित थे, फिर भी वे कुमारों के सामने ऐसे प्रस्तुत हुए मानो यह विद्या उन्हें कुछ पता ही न हो। भाव यह है कि यदि कोई व्यक्ति कितना भी ऊँचा क्यों न हो, सब कुछ क्यों न जाने, पर अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति के सामने उसे प्रश्न अवश्य करने चाहिए। उदाहरण के लिए, यद्यपि अर्जुन को सभी आध्यात्मिक विद्या का ज्ञान था, फिर भी उन्होंने कृष्ण के सामने इस प्रकार प्रश्न किया मानो उन्हें कुछ पता ही न हो। इसी प्रकार पृथु महाराज को सब कुछ का ज्ञान था, फिर भी वे कुमारों के सामने ऐसे प्रस्तुत हुए जैसे उन्हें कुछ भी पता न हो। भाव यह है कि उच्चकोटि के व्यक्ति भगवान सर्वशक्तिमान या उनके भक्तों के समक्ष प्रश्न करते हैं ताकि सामान्य लोगों का भला हो। इसलिए कभी-कभी महान व्यक्ति अपने को ऐसी स्थिति में डाल देते हैं और किसी उच्च अधिकारी से प्रश्न करते हैं क्योंकि वे हमेशा दूसरों का भला सोचते हैं।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)