श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  4.21.45 
मैत्रेय उवाच
इति ब्रुवाणं नृपतिं पितृदेवद्विजातय: ।
तुष्टुवुर्हृष्टमनस: साधुवादेन साधव: ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
ऋषि मैत्रेय ने कहा: राजा पृथु के इस प्रकार सुंदर भाषण को सुनकर सभी देवताओं, पितृलोक के निवासियों, ब्राह्मणों और उस सभा में उपस्थित साधु-संतों ने अपनी शुभकामनाओं को व्यक्त करते हुए उनकी प्रशंसा की।
 
Sage Maitreya said: Hearing King Prithu speak in this manner, all the gods, residents of Pitriloka, Brahmins and the saints present in the assembly expressed their good wishes and congratulated him.
तात्पर्य
जब कोई व्यक्ति सभा में बहुत मधुरता से बोलता है, तो श्रोता उसको बधाई देते हैं, जो अपने शुभ भाव को साधु, साधु शब्दों से व्यक्त करते हैं। इसे साधु-वाद कहते हैं। सभी सन्त जन, पितर (पितृलोक के निवासी) और देवता जो सभा में उपस्थित थे और पृथु महाराज को सुन रहे थे, ने अपने शुभ भाव को साधु, साधु शब्दों से व्यक्त किया। उन्होंने सभी पृथु महाराज के अच्छे उद्देश्य को स्वीकार किया, और वे पूरी तरह से संतुष्ट हुए।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)