श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  4.21.40 
पुमाँल्लभेतानतिवेलमात्मन:
प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वत: स्वयम् ।
यन्नित्यसम्बन्धनिषेवया तत:
परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम् ॥ ४० ॥
 
 
अनुवाद
नियमित रूप से ब्राह्मणों और वैष्णवों की सेवा करने से व्यक्ति के दिल का मैल दूर हो जाता है और इस तरह परम शांति और भौतिक आसक्ति से मुक्ति मिलती है और वह संतुष्ट हो जाता है। इस संसार में ब्राह्मणों की सेवा से बढक़र कोई कर्मफलदायी कर्म नहीं है, क्योंकि इससे देवता प्रसन्न होते हैं जिनके लिए अनेक यज्ञों की सिफारिश की जाती है।
 
By serving Brahmins and Vaishnavas regularly, the dirt of a person's heart is removed and thus he gets supreme peace and freedom from material attachment and becomes satisfied. There is no greater selfish act in this world than serving Brahmins, because this pleases the gods for whom many sacrifices are recommended.
तात्पर्य
भगवद्गीता (2.65) मे कहा गया है, प्रसादे सर्व-दुःख नामा हानि अस्योपजायते| जब तक कोई आत्म संतुष्ट नहीं होता है, वह भौतिक अस्तित्व की दयनीय स्थितियो से मुक्त नहीं हो सकता है| इसलिए आत्म संतुष्टि की पूर्णता प्राप्त करने के लिए ब्राह्मणों और वैष्णवों की सेवा करना आवश्यक है| श्रील नर्रोतम दास ठाकुर कहते है: तांडेरा चरण सेवा भक्त-सने वास| जन्म जन्म हाय, ए अभिलाष | "जन्म जन्म के लिए मेरी इच्छा है आचार्यों के कमल चरणों की सेवा करने और भक्तों के समाज मे रहने की|" आध्यात्मिक माहौल केवल भक्तों के समाज मे रहकर और आचार्यों के आदेशों की सेवा करके ही बनाया जा सकता है| आध्यात्मिक गुरु सर्व श्रेष्ठ ब्राह्मण है| आज कल कली युग में ब्राह्मण-कुला या ब्राह्मण वर्ग की सेवा करना बहुत मुश्किल है| वराह पुराण के अनुसार कठिनाई यह है की दानवों ने कलि-युग का फायदा उठाकर ब्राह्मण परिवारों में जन्म लिया है| राक्षसाः कलीम आश्रित्य जायन्ते ब्रह्मयोनिषु (वराह पुराण)| दूसरे शब्दों मे, इस युग मे बहुत से तथाकथित जातिगत ब्राह्मण और जातिगत गोस्वामी है, जो शास्त्र और आम लोगों की भोली- भाली का फायदा उठाकर अपने को ब्राह्मण और वैष्णव होने का वंशानुगत दवा करते है| ऐसे झूठे ब्रह्माण-कुला की सेवा करने से कुछ भी प्राप्त नहीं होगा| इसलिए चाहिए की सच्चे आध्यात्मिक गुरु और उनके साथियों की शरण ली जाये और उनकी सेवा भी की जाये क्योंकि ऐसी गतिविधि नये लोगों को पूर्ण संतुष्टि प्राप्त करने में काफी मदद करेगी| श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर ने अपने व्यख्या मे "व्यवसायत्मिका बुद्धिरेकेहा कुरु-नंदन (भगवद गीता 2.41)" श्लोक को बहुत स्पष्ट रूप से समझाया है| श्रील नर्रोतम दास ठाकुर द्वारा सुझाए भक्ति-योग के नियमित सिद्धांतों का अनुसरण करके, कोई बहुत जल्दी मुक्ति के ट्रान्सेंडैंटल स्तर पर आ सकता है, जैसा इस श्लोक (अत्यंत-शम) में समझाया गया है| विशेष रूप से "अनतिवेला" शब्द का उपयोग, "बिना देर किए" बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल ब्राह्मणों और वैष्णवों की सेवा करके ही व्यक्ति मुक्ति पा सकता है| गंभीर तपस्या और कठोरता से गुजरने की कोई आवश्यकता नहीं है| इसका स्पष्ट उदाहरण है खुद नारद मुनि| पिछले जन्म में, वह केवल एक दासी का बेटा था, लेकिन उसे उत्तम ब्राह्मणों और वैष्णवों की सेवा करने का अवसर मिला, और इस तरह अपने अगले जन्म में उन्होंने न केवल मुक्ति पाई, बल्कि पूरे वैष्णव वंशपरंपरा के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रसिद्ध हुए| इसलिए वैदिक प्रणाली के अनुसार, यह प्रथागत रूप से अनुशंसा की जाती है कि अनुष्ठानिक समारोह करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए|
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)