श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 21: महाराज पृथु द्वारा उपदेश  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  4.21.13 
एकदासीन्महासत्रदीक्षा तत्र दिवौकसाम् ।
समाजो ब्रह्मर्षीणां च राजर्षीणां च सत्तम ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
एक समय राजा पृथु ने एक महान यज्ञ करने का व्रत लिया जिसमें कई महान ऋषि, ब्राह्मण, विभिन्न ऊंचे ग्रहों से आये हुए देवता और बड़े-बड़े राजर्षि एकत्रित हुए।
 
Once King Prithu vowed to perform a great sacrifice, in which sages, Brahmins, heavenly gods and great kings gathered.
तात्पर्य
इस छंद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यद्यपि राजा पृथु के निवास स्थल भारत में गंगा और यमुना नदियों के बीच थे, लेकिन उस यज्ञ में देवताओं ने भी भाग लिया था जो उन्होंने किया था। इससे पता चलता है कि पहले देवता इस ग्रह पर आया करते थे। इसी तरह, अर्जुन, युधिष्ठिर और कई अन्य महापुरुष भी उच्च ग्रह प्रणालियों में जाते थे। इस प्रकार उपयुक्त हवाई जहाजों और अंतरिक्ष यानों के द्वारा ग्रहों के बीच आदान-प्रदान होता था।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)