श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  4.20.9 
य: स्वधर्मेण मां नित्यं निराशी: श्रद्धयान्वित: ।
भजते शनकैस्तस्य मनो राजन् प्रसीदति ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
भगवान विष्णु ने फिर कहा: हे राजा पृथु, जब कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को निभाते हुए बिना किसी भौतिक लाभ के मेरे प्रति प्रेम भाव से सेवा करता है, तो वह धीरे-धीरे अपने भीतर बहुत संतुष्ट हो जाता है।
 
भगवान विष्णु ने फिर कहा: हे राजा पृथु, जब कोई व्यक्ति अपने कर्तव्य को निभाते हुए बिना किसी भौतिक लाभ के मेरे प्रति प्रेम भाव से सेवा करता है, तो वह धीरे-धीरे अपने भीतर बहुत संतुष्ट हो जाता है।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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