श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.20.7 
एक: शुद्ध: स्वयंज्योतिर्निर्गुणोऽसौ गुणाश्रय: ।
सर्वगोऽनावृत: साक्षी निरात्मात्मात्मन: पर: ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
आत्मा एक, शुद्ध, भौतिक-रहित और स्वयं प्रकाशित है। सभी अच्छे गुणों का भंडार और सर्वव्यापी है। आत्मा किसी भौतिक आवरण से रहित है और सभी गतिविधियों का साक्षी है। यह अन्य जीवों से सर्वथा भिन्न है और सभी देहधारियों से परे है।
 
The soul is one, pure, immaterial and self-effulgent. It is the repository of all good qualities and is omnipresent. It is devoid of any physical covering and is the witness of all actions. It is completely different from other living entities and beyond all embodied beings.
तात्पर्य
पिछले छंद में दो महत्वपूर्ण शब्दों का प्रयोग किया गया है: असंश्कत, जिसका अर्थ है "बिना लगाव के", और बुद्ध, जिसका अर्थ है "हर चीज के बारे में पूरी तरह से अवगत होना"। पूर्ण संज्ञान से यह अभिप्राय है कि व्यक्ति को अपनी संवैधानिक स्थिति के साथ-साथ ईश्वर के परम व्यक्तित्व की स्थिति के बारे में पता होना चाहिए। श्री विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के अनुसार, इस श्लोक में भगवान विष्णु स्वयं का वर्णन कर रहे हैं, या परमात्मा। परमात्मा हमेशा सशरीरी आत्मा के साथ-साथ भौतिक दुनिया से अलग होता है। इसलिए उन्हें परा के रूप में वर्णित किया गया है। वह परा, या भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, एक है, जिसका अर्थ है "एक"। भगवान एक हैं, जबकि भौतिक दुनिया में सन्निहित बंधी हुई आत्माएं कई प्रकार के रूप में मौजूद हैं। देवता, मनुष्य, पशु, पेड़, पक्षी, मधुमक्खियां और भी बहुत कुछ हैं। इस प्रकार जीवित संस्थाएं एक नहीं बल्कि कई हैं। जैसा कि वेदों में पुष्टि की गई है: नित्यो नित्यानाम चेतनश चेतनानाम्। जीवित संस्थाएं, जो कई हैं और जो इस भौतिक दुनिया में उलझे हुए हैं, शुद्ध नहीं हैं। हालाँकि, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व शुद्ध और अनासक्त है। भौतिक शरीर से आच्छादित होने के कारण, जीव संस्थाएं स्वयं प्रकाशित नहीं होती हैं, लेकिन भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, परमात्मा, स्वयं प्रकाशित है। भौतिक प्रकृति के प्रकारों से दूषित होने वाली जीवित संस्थाओं को सगुण कहा जाता है, जबकि परमात्मा, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, निर्गुण है, जो भौतिक प्रकारों के प्रभाव में नहीं है। भौतिक गुणों में कैद होने वाली जीवित संस्थाएं गुणाश्रित हैं, जबकि भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व गुणाश्रय है। वातानुकूलित आत्मा की दृष्टि भौतिक संदूषण से आच्छादित है; इसलिए वह अपने कार्यों का कारण नहीं देख सकता है, और वह अपने पिछले जन्मों को नहीं देख सकता है। भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, भौतिक शरीर से आच्छादित नहीं होने के कारण, जीवित संस्था की सभी गतिविधियों का साक्षी है। लेकिन वे दोनों, जीवित संस्था और परमात्मा, भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व, आत्मा या आत्मा हैं। वे गुणवत्ता में एक हैं, फिर भी वे कई तरह से भिन्न हैं, विशेष रूप से उन छह ऐश्वर्य के संबंध में जो भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के पास पूर्ण हैं। पूर्ण ज्ञान का अर्थ है कि जीव-आत्मा, जीवित संस्था को अपनी स्थिति और सर्वोच्च की स्थिति दोनों को जानना चाहिए। यही पूर्ण ज्ञान है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)