श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  4.20.5 
अत: कायमिमं विद्वानविद्याकामकर्मभि: ।
आरब्ध इति नैवास्मिन्प्रतिबुद्धोऽनुषज्जते ॥ ५ ॥
 
 
अनुवाद
जो लोग जीवन की देहात्मबुद्धि की अवधारणा को भली-भाँति जानते हैं, वे यह जानते हैं कि यह शरीर अज्ञानता, इच्छाओं और भ्रम से उत्पन्न कर्मों से मिलकर बना है, वे इस शरीर के प्रति आसक्त नहीं होते हैं।
 
Those who are well acquainted with the concept of life as embodied soul, who know that this body is created out of ignorance, desires and actions born of attachment, they never get attached to this body.
तात्पर्य
जैसे पिछले श्लोक में बताया गया है, अच्छी बुद्धि (सुधियः) वाले लोग खुद को शरीर नहीं मानते हैं। अज्ञान के निर्माण होने के नाते, शरीर का दो प्रकार के कार्य होते हैं। शारीरिक अवधारणा में, जब हम सोचते हैं कि इंद्रिय संतुष्टि हमारी मदद करेगी, तो हम भ्रम में होते हैं। एक अन्य प्रकार का भ्रम यह है कि यह सोचना कि भ्रामक शरीर से उत्पन्न होने वाली इच्छाओं को संतुष्ट करने या उच्च ग्रह प्रणालियों में ऊंचाई प्राप्त करने या विभिन्न प्रकार के वैदिक अनुष्ठान करने से कोई खुश हो जाएगा। यह सब भ्रम है। इसी तरह, राजनीतिक मुक्ति और सामाजिक और मानवीय गतिविधियों के लिए की गई भौतिक गतिविधियाँ इस विचार से की जाती हैं कि दुनिया के लोग खुश होंगे भी भ्रामक हैं क्योंकि मूल सिद्धांत शारीरिक अवधारणा है, जो भ्रामक है। शारीरिक अवधारणा के तहत हम जो भी कामना करते हैं या करते हैं, वह सब भ्रम है। दूसरे शब्दों में, भगवान विष्णु ने पृथु महाराज को सूचित किया कि यद्यपि बलिदान प्रदर्शन आम लोगों के लिए एक उदाहरण स्थापित करते हैं, जहाँ तक उनके व्यक्तिगत स्वयं का सवाल है, ऐसे किसी भी अनुष्ठान प्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं थी। जैसा कि भगवद-गीता (2.45) में पुष्टि की गई है:

त्रैगुण्य-विषया वेदा

निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन

निर्द्वन्द्वो नित्य-सत्त्व-स्थो

निर्योग-क्षेम आत्मवान

"वेद मुख्य रूप से भौतिक प्रकृति के तीन प्रकार के विषयों से संबंधित हैं। इन तरीकों से ऊपर उठो, हे अर्जुन। उन सभी के प्रति पारलौकिक बनो। सभी द्वंद्वों से मुक्त हो जाओ और लाभ और सुरक्षा के लिए सभी चिंताओं से मुक्त हो जाओ, और आत्म में स्थापित हो जाओ।"

वेदों में अनुशंसित कर्मकांड प्रदर्शन मुख्य रूप से भौतिक प्रकृति के तीन प्रकार के विषयों पर निर्भर करते हैं। फलस्वरूप अर्जुन को वैदिक गतिविधियों से परे जाने की सलाह दी गई। अर्जुन को जिन गतिविधियों को करने की सलाह दी गई थी वे भक्ति सेवा की पारलौकिक गतिविधियाँ थीं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)