श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  4.20.37 
भगवानपि राजर्षे: सोपाध्यायस्य चाच्युत: ।
हरन्निव मनोऽमुष्य स्वधाम प्रत्यपद्यत ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
राजा और वहाँ उपस्थित पुरोहितों के मन को अपनी ओर आकर्षित कर, भगवान परम व्यक्तित्व अपनी दिव्य आभा के साथ आकाशलोक को लौट गए।
 
राजा और वहाँ उपस्थित पुरोहितों के मन को अपनी ओर आकर्षित कर, भगवान परम व्यक्तित्व अपनी दिव्य आभा के साथ आकाशलोक को लौट गए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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