श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  4.20.37 
भगवानपि राजर्षे: सोपाध्यायस्य चाच्युत: ।
हरन्निव मनोऽमुष्य स्वधाम प्रत्यपद्यत ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
राजा और वहाँ उपस्थित पुरोहितों के मन को अपनी ओर आकर्षित कर, भगवान परम व्यक्तित्व अपनी दिव्य आभा के साथ आकाशलोक को लौट गए।
 
After captivating the minds of the king and the priests present there, Lord Achyuta returned to his abode in Paravyoma.
तात्पर्य
क्योंकि परमेश्वर का व्यक्तित्व पूर्णतः आध्यात्मिक है, वह बिना शरीर बदले अध्यात्मिक आकाश से अवतरित हो सकते हैं, और इसलिए उन्हें अच्युत या अचूक कहा जाता है। हालाँकि, जब कोई जीवित प्राणी भौतिक दुनिया में गिर जाता है, तो उसे एक भौतिक शरीर को स्वीकार करना पड़ता है, और इसलिए अपने भौतिक अवतार में उसे अच्युत नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि वह प्रभु की सेवा में अपनी वास्तविक व्यस्तता से पतित हो जाता है, जीवित प्राणी को जीवन की दयनीय भौतिक स्थितियों में कष्ट झेलने या आनंद लेने का प्रयास करने के लिए एक भौतिक शरीर मिलता है। इसलिए पतित जीवित प्राणी च्युत है, जबकि प्रभु को अच्युत कहा जाता है। प्रभु सभी के लिए आकर्षक थे - न केवल राजा बल्कि पुरोहित वर्ग भी, जो वैदिक अनुष्ठानों के प्रदर्शन के बहुत आदी थे। क्योंकि प्रभु सर्व-आकर्षक हैं, उन्हें कृष्ण कहा जाता है, या "जो सभी को आकर्षित करते हैं"। प्रभु महाराज पृथु के यज्ञ स्थल पर क्षीरसागर में निवास करने वाले विष्णु के रूप में प्रकट हुए, जो कृष्ण के ही एक पूर्ण विस्तार हैं। वह कारणार्णव शयी विष्णु के दूसरे अवतार हैं, जो भौतिक सृष्टि का उद्गम हैं और गर्बोदक शयी विष्णु के रूप में विस्तारित होते हैं, जो तब प्रत्येक ब्रह्मांड में प्रवेश करते हैं। क्षीरसागर में निवास करने वाले विष्णु उन पुरुषों में से एक हैं जो प्रकृति के भौतिक गुणों को नियंत्रित करते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)