श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 35-36
 
 
श्लोक  4.20.35-36 
देवर्षिपितृगन्धर्वसिद्धचारणपन्नगा: ।
किन्नराप्सरसो मर्त्या: खगा भूतान्यनेकश: ॥ ३५ ॥
यज्ञेश्वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तित: ।
सभाजिता ययु: सर्वे वैकुण्ठानुगतास्तत: ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
राजा पृथु ने देवताओं, ऋषियों, पितृलोक, गंधर्वलोक, सिद्धलोक, चारणलोक, पन्नगलोक, किन्नरलोक, अप्सरो लोक और पृथ्वी के निवासियों और पक्षियों के लोकों के वासियों की पूजा की। उन्होंने यज्ञस्थल पर उपस्थित अन्य सभी प्राणियों की भी पूजा की। हाथ जोड़कर, मीठे शब्दों और यथासंभव अधिक से अधिक धन अर्पित करते हुए, उन्होंने भगवान के सभी पार्षदों की भी पूजा की। इस उत्सव के बाद, वे सभी भगवान विष्णु के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए अपने-अपने स्थानों पर लौट गए।
 
King Prithu worshipped the gods, sages, the inhabitants of Pitrloka, Gandharvaloka, Siddhaloka, Charanloka, Pannagaloka, Kinnarloka, Apsaroloka, Earthloka and the world of birds. He worshipped many other beings present at the place of sacrifice. He worshipped all these and the Lord's associates with sweet words and with as much wealth as possible, with folded hands. After this festival, following the footsteps of Lord Vishnu, they all went to their respective worlds.
तात्पर्य
आधुनिक तथाकथित वैज्ञानिक समाज में यह विचार व्याप्त है कि अन्य ग्रहों पर जीवन नहीं है और केवल इस पृथ्वी पर ही बुद्धिमान और वैज्ञानिक ज्ञान वाले जीव-जंतु हैं। हालाँकि, वैदिक साहित्य इस मूर्खतापूर्ण सिद्धांत को स्वीकार नहीं करते हैं। वैदिक ज्ञान के अनुयायी विभिन्न प्रकार के जीव-जंतुओं से युक्त विभिन्न ग्रहों से पूरी तरह अवगत हैं जैसे कि देवताओं, ऋषियों, पितृ, गंधर्व, पन्नग, किन्नर, चारण, सिद्ध और अप्सराएँ। वेदों में जानकारी दी गई है कि सभी ग्रहों में - न केवल इस भौतिक आकाश में बल्कि आध्यात्मिक आकाश में भी - विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु हैं। यद्यपि ये सभी जीव-जंतु एक ही आध्यात्मिक प्रकृति के हैं, गुणवत्ता में भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के समान, उनके शरीरों में भिन्नताएँ हैं क्योंकि आठ भौतिक तत्वों द्वारा आत्मा का अवतार है, अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और मिथ्या अहंकार। हालाँकि, आध्यात्मिक दुनिया में शरीर और आत्मा के बीच ऐसा कोई भेद नहीं है। भौतिक दुनिया में, विभिन्न ग्रहों में विभिन्न प्रकार के शरीरों में विशिष्ट विशेषताएं प्रकट होती हैं। हमारे पास वैदिक साहित्य से पूरी जानकारी है कि प्रत्येक ग्रह में, दोनों भौतिक और आध्यात्मिक, विभिन्न बुद्धि के जीव-जंतु हैं। पृथ्वी, भूरलोक ग्रह प्रणाली के ग्रहों में से एक है। भूरलोक के ऊपर छह ग्रह प्रणालियाँ और इसके नीचे सात ग्रह प्रणालियाँ हैं। इसलिए पूरे ब्रह्मांड को चतुर्दश-भुवन के रूप में जाना जाता है, यह दर्शाता है कि इसमें चौदह अलग-अलग ग्रह प्रणालियाँ हैं। भौतिक आकाश में ग्रह प्रणालियों के पार, एक और आकाश है, जिसे पराव्योम या आध्यात्मिक आकाश के रूप में जाना जाता है, जहां आध्यात्मिक ग्रह हैं। उन ग्रहों के निवासी भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के लिए विभिन्न प्रकार की प्रेमपूर्ण सेवा में संलग्न हैं, जिसमें विभिन्न रस या संबंध शामिल हैं, जिन्हें दास्य-रस, सख्य-रस, वात्सल्य-रस, माधुर्य-रस और सभी से ऊपर, परकीय-रस कहा जाता है। यह परकीय-रस या परम प्रेम कृष्णलोक में प्रचलित है, जहाँ भगवान कृष्ण रहते हैं। इस ग्रह को गोलोक वृंदावन भी कहा जाता है, और यद्यपि भगवान कृष्ण वहां निरंतर निवास करते हैं, फिर भी वे लाखों-करोड़ों रूपों में स्वयं का विस्तार करते हैं। ऐसे ही एक रूप में वे इस भौतिक ग्रह पर वृंदावन-धाम नामक एक विशेष स्थान पर प्रकट होते हैं, जहाँ वे आध्यात्मिक आकाश में गोलोक वृंदावन-धाम के अपने मूल अतीत को प्रदर्शित करते हैं ताकि वातानुकूलित आत्माओं को वापस घर, वापस भगवान के पास आकर्षित किया जा सके।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)