श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.20.34 
मैत्रेय उवाच
इति वैन्यस्य राजर्षे: प्रतिनन्द्यार्थवद्वच: ।
पूजितोऽनुगृहीत्वैनं गन्तुं चक्रेऽच्युतो मतिम् ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
महान ऋषि मैत्रेय ने विदुर से कहा कि भगवान ने महाराज पृथु द्वारा की गई सार्थक प्रार्थना की बहुत प्रशंसा की। इसलिए, राजा द्वारा उचित रूप से पूजे जाने के बाद, भगवान ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वापस जाने का निर्णय लिया।
 
Maitreya told Vidura that the Lord had praised the meaningful prayer of King Prithu very highly. Thus being properly worshipped by the king, the Lord blessed him and decided to depart.
तात्पर्य
इस श्लोक में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शब्द प्रतीनाद्यार्थवद् वचः हैं, जो यह इंगित करते हैं कि प्रभु ने राजा की अत्यंत अर्थपूर्ण प्रार्थनाओं की सराहना की थी। जब कोई भक्त प्रभु से प्रार्थना करता है, तो यह भौतिक लाभों के लिए नहीं, बल्कि प्रभु के कृपा पाने के लिए होता है; वह प्रार्थना करता है कि जन्म के बाद जन्म उसे प्रभु के कमलों में लीन होने का सौभाग्य प्राप्त हो। इसलिए प्रभु चैतन्य ने मामा जन्मानि जन्मानि शब्दों का प्रयोग किया है, जिसका अर्थ है "जन्म के बाद जन्म", क्योंकि एक भक्त जन्म-चक्र को रोकने में भी रुचि नहीं रखता है। प्रभु और भक्त इस भौतिक दुनिया में जन्म के बाद जन्म लेते रहते हैं, परन्तु ऐसे जन्म पारलौकिक होते हैं। भगवद-गीता के चतुर्थ अध्याय में प्रभु ने अर्जुन को सूचित किया था कि वह और अर्जुन पहले भी कई जन्म ले चुके थे, लेकिन प्रभु को उन सभी जन्मों के बारे में याद था, जबकि अर्जुन उन्हें भूल चुका था। प्रभु और उनके प्रिय भक्त प्रभु के मिशन को पूरा करने के लिए अनेक बार अवतार लेते हैं, परन्तु चूँकि ऐसे जन्म पारलौकिक होते हैं, इसलिए इनमें भौतिक जन्म की दयनीय दशाएँ नहीं होती हैं, और इसलिए इन्हें दिव्य, पारलौकिक कहा जाता है।

प्रभु और भक्त के पारलौकिक जन्म को समझना होगा। प्रभु के अवतार लेने का उद्देश्य भक्तिमार्ग की स्थापना करना है, जो धर्म की परिपूर्ण प्रणाली है, और भक्त के जन्म का उद्देश्य उसी धर्म प्रणाली या भक्ति पंथ को पूरे विश्व में प्रसारित करना है। पृथु महाराज भक्ति पंथ का प्रचार करने की प्रभु की शक्ति के अवतार थे, और प्रभु ने उन्हें उनके पद पर अडिग रहने का आशीर्वाद दिया था। इस प्रकार जब राजा ने किसी भी भौतिक वरदान को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, तो प्रभु ने उनके उस इनकार की बहुत प्रशंसा की। इस श्लोक में एक और महत्वपूर्ण शब्द अच्युत है, जिसका अर्थ है "अचूक"। यद्यपि प्रभु इस भौतिक दुनिया में अवतार लेते हैं, परन्तु उन्हें कभी भी बद्ध आत्माओं में से एक नहीं माना जाना चाहिए, जो सभी भ्रामक हैं। जब प्रभु प्रकट होते हैं, तो वे अपनी आध्यात्मिक स्थिति में बने रहते हैं, भौतिक प्रकृति की प्रवृत्तियों से अछूते रहते हैं, और इसलिए भगवद-गीता में प्रभु आत्मा-मायाया, "आंतरिक शक्ति द्वारा प्रदर्शन किया गया" के रूप में अपने प्रकट होने की गुणवत्ता को व्यक्त करते हैं। प्रभु, अचूक होने के कारण, भौतिक प्रकृति द्वारा इस भौतिक दुनिया में जन्म लेने के लिए बाध्य नहीं होते हैं। वे धार्मिक सिद्धांतों के परिपूर्ण क्रम को पुनः स्थापित करने और मानव समाज में आसुरी प्रभाव को नष्ट करने के लिए अवतार लेते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)