प्रभु और भक्त के पारलौकिक जन्म को समझना होगा। प्रभु के अवतार लेने का उद्देश्य भक्तिमार्ग की स्थापना करना है, जो धर्म की परिपूर्ण प्रणाली है, और भक्त के जन्म का उद्देश्य उसी धर्म प्रणाली या भक्ति पंथ को पूरे विश्व में प्रसारित करना है। पृथु महाराज भक्ति पंथ का प्रचार करने की प्रभु की शक्ति के अवतार थे, और प्रभु ने उन्हें उनके पद पर अडिग रहने का आशीर्वाद दिया था। इस प्रकार जब राजा ने किसी भी भौतिक वरदान को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, तो प्रभु ने उनके उस इनकार की बहुत प्रशंसा की। इस श्लोक में एक और महत्वपूर्ण शब्द अच्युत है, जिसका अर्थ है "अचूक"। यद्यपि प्रभु इस भौतिक दुनिया में अवतार लेते हैं, परन्तु उन्हें कभी भी बद्ध आत्माओं में से एक नहीं माना जाना चाहिए, जो सभी भ्रामक हैं। जब प्रभु प्रकट होते हैं, तो वे अपनी आध्यात्मिक स्थिति में बने रहते हैं, भौतिक प्रकृति की प्रवृत्तियों से अछूते रहते हैं, और इसलिए भगवद-गीता में प्रभु आत्मा-मायाया, "आंतरिक शक्ति द्वारा प्रदर्शन किया गया" के रूप में अपने प्रकट होने की गुणवत्ता को व्यक्त करते हैं। प्रभु, अचूक होने के कारण, भौतिक प्रकृति द्वारा इस भौतिक दुनिया में जन्म लेने के लिए बाध्य नहीं होते हैं। वे धार्मिक सिद्धांतों के परिपूर्ण क्रम को पुनः स्थापित करने और मानव समाज में आसुरी प्रभाव को नष्ट करने के लिए अवतार लेते हैं।
