श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.20.33 
तत्त्वं कुरु मयादिष्टमप्रमत्त: प्रजापते ।
मदादेशकरो लोक: सर्वत्राप्नोति शोभनम् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रजा के रक्षक राजन! अब से मेरी आज्ञा का पालन करने में सावधानी रखना और किसी भी तरह से बहकावे में मत आना। जो भी श्रद्धा से इस प्रकार मेरी आज्ञा का पालन करता है उसका सर्वत्र मंगल होता है।
 
O king who protects his subjects, from now on be careful in obeying my orders and do not be misled in any way. Whoever obeys my orders with devotion in this manner will be blessed everywhere.
तात्पर्य
धार्मिक जीवन का सार सर्वोच्च भगवान के आदेशों का पालन करना है, और जो ऐसा करता है वह पूर्ण रूप से धार्मिक होता है। भगवद्-गीता (18.65) में सर्वोच्च भगवान कृष्ण कहते हैं, मन्मना भव मद्भक्तः: "बस हमेशा मेरे बारे में सोचो और मेरे भक्त बनो।" इसके अलावा, भगवान कहते हैं, सर्व-धर्मन् परित्यज्य माम एकं शरणं व्रज: "सभी प्रकार की भौतिक व्यस्तताओं को त्याग दो और बस मेरे आत्मसमर्पण कर दो।" (भगवद गीता 18.66) यह धर्म का प्राथमिक सिद्धांत है। जो कोई भी भगवान से सीधे ऐसे आदेश का पालन करता है वह वास्तव में एक धार्मिक व्यक्ति होता है। दूसरों को ढोंगी के रूप में वर्णित किया जाता है, क्योंकि दुनिया भर में धर्म के नाम पर कई गतिविधियाँ चल रही हैं जो वास्तव में धार्मिक नहीं हैं। हालाँकि, जो सर्वोच्च भगवान के आदेश का पालन करता है, उसकी दुनिया भर में केवल भलाई होती है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)