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श्लोक 4.20.33  |
तत्त्वं कुरु मयादिष्टमप्रमत्त: प्रजापते ।
मदादेशकरो लोक: सर्वत्राप्नोति शोभनम् ॥ ३३ ॥ |
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| अनुवाद |
| हे प्रजा के रक्षक राजन! अब से मेरी आज्ञा का पालन करने में सावधानी रखना और किसी भी तरह से बहकावे में मत आना। जो भी श्रद्धा से इस प्रकार मेरी आज्ञा का पालन करता है उसका सर्वत्र मंगल होता है। |
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| हे प्रजा के रक्षक राजन! अब से मेरी आज्ञा का पालन करने में सावधानी रखना और किसी भी तरह से बहकावे में मत आना। जो भी श्रद्धा से इस प्रकार मेरी आज्ञा का पालन करता है उसका सर्वत्र मंगल होता है। |
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