श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.20.30 
मन्ये गिरं ते जगतां विमोहिनीं
वरं वृणीष्वेति भजन्तमात्थ यत् ।
वाचा नु तन्त्या यदि ते जनोऽसित:
कथं पुन: कर्म करोति मोहित: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, आपके भक्त ने जो कहा है, वह निश्चय ही बहुत आश्चर्यजनक है। आपने वेदों में जो लालच दिए हैं, वे शुद्ध भक्तों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। आम लोग वेदों की मीठी वाणी में बंधकर पुन: पुनः कर्मफल से मोहित होकर कर्मकांडों में लगे रहते हैं।
 
हे प्रभु, आपके भक्त ने जो कहा है, वह निश्चय ही बहुत आश्चर्यजनक है। आपने वेदों में जो लालच दिए हैं, वे शुद्ध भक्तों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। आम लोग वेदों की मीठी वाणी में बंधकर पुन: पुनः कर्मफल से मोहित होकर कर्मकांडों में लगे रहते हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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