श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  4.20.30 
मन्ये गिरं ते जगतां विमोहिनीं
वरं वृणीष्वेति भजन्तमात्थ यत् ।
वाचा नु तन्त्या यदि ते जनोऽसित:
कथं पुन: कर्म करोति मोहित: ॥ ३० ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, आपके भक्त ने जो कहा है, वह निश्चय ही बहुत आश्चर्यजनक है। आपने वेदों में जो लालच दिए हैं, वे शुद्ध भक्तों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। आम लोग वेदों की मीठी वाणी में बंधकर पुन: पुनः कर्मफल से मोहित होकर कर्मकांडों में लगे रहते हैं।
 
O Lord, whatever you have told your pure devotee is certainly going to cause extreme delusion. The temptations you have given in the Vedas are not suitable for pure devotees. Ordinary people, bound by the nectarine words of the Vedas and deluded by the results of their actions, keep on doing fruitive actions again and again.
तात्पर्य
गौड़ीय सम्प्रदाय के एक महान आचार्य, श्रील नारोत्तम दास ठाकुर ने कहा है कि जो व्यक्ति वेदों की फलदायी गतिविधियों, जैसे कर्म-कांड और ज्ञान-कांड, से बहुत अधिक जुड़े हुए हैं, निश्चित रूप से बर्बाद हो गए हैं। वेदों में तीन श्रेणियों की गतिविधियाँ होती हैं, जिन्हें कर्म-कांड (फलदायी गतिविधियाँ), ज्ञान-कांड (दार्शनिक शोध) और उपासना-कांड (भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए विभिन्न देवताओं की पूजा) के रूप में जाना जाता है। जो लोग कर्म-कांड और ज्ञान-कांड में लगे हुए हैं वे इस अर्थ में बर्बाद हो गए हैं कि हर कोई बर्बाद हो जाता है जो इस भौतिक शरीर में फँस जाता है, चाहे वह देवता, राजा, निम्न जानवर या जो भी हो। भौतिक प्रकृति के त्रिगुणात्मक कष्टों की पीड़ा सभी के लिए समान होती है। अपनी आध्यात्मिक स्थिति को समझने के लिए ज्ञान की खेती भी, कुछ हद तक, समय की बर्बादी है। क्योंकि जीव सर्वोच्च भगवान का एक शाश्वत अंश है, उसका तात्कालिक व्यवसाय खुद को भक्ति सेवा में संलग्न करना है। इसलिए पृथु महाराज कहते हैं कि भौतिक आशीर्वाद का आकर्षण इस भौतिक दुनिया में उलझने का एक और जाल है। इसलिए वह भगवान से स्पष्ट रूप से कहते हैं कि भौतिक सुविधाओं के रूप में भगवान की आशीर्वाद की भेंट निश्चित रूप से विचलन का कारण है। एक शुद्ध भक्त भक्ति या मुक्ति में बिल्कुल भी रुचि नहीं रखता है।

प्रभु कभी-कभी नौसिखिए भक्तों को आशीर्वाद देते हैं जिन्होंने अभी तक यह नहीं समझा है कि भौतिक सुविधाएँ उन्हें खुश नहीं करेंगी। इसलिए चैतन्य-चरितामृत में प्रभु कहते हैं कि एक ईमानदार भक्त जो बहुत बुद्धिमान नहीं है, वह प्रभु से कुछ भौतिक लाभ मांग सकता है, लेकिन प्रभु, सर्वज्ञ होने के नाते, आम तौर पर भौतिक पुरस्कार नहीं देते हैं, बल्कि इसके विपरीत, जो भी भौतिक सुविधाएँ उनके भक्त द्वारा प्राप्त की जा रही हैं, वे उसे छीन लेते हैं, ताकि अंततः भक्त पूरी तरह से उनके प्रति समर्पण कर दे। दूसरे शब्दों में, भौतिक लाभ के रूप में आशीर्वाद की पेशकश भक्त के लिए कभी भी शुभ नहीं होती है। वेदों के बयान जो महान बलिदानों के बदले में स्वर्गीय ग्रहों को ऊंचाई प्रदान करते हैं, बस विचलित करने वाले हैं। इसलिए भगवद-गीता (2.42) में भगवान कहते हैं, याम इमां पुष्पितां वाचम प्रवदन्त्य विपश्चितः: पुरुषों का कम बुद्धिमान वर्ग (विपश्चितः), वेदों की फूलों वाली भाषा से आकर्षित होकर, भौतिक रूप से लाभान्वित होने के लिए फलदायी गतिविधियों में संलग्न होता है। इस प्रकार वे जीवन के बाद जीवन, विभिन्न शारीरिक रूपों में, बहुत, बहुत कठिन खोज जारी रखते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)