प्रभु कभी-कभी नौसिखिए भक्तों को आशीर्वाद देते हैं जिन्होंने अभी तक यह नहीं समझा है कि भौतिक सुविधाएँ उन्हें खुश नहीं करेंगी। इसलिए चैतन्य-चरितामृत में प्रभु कहते हैं कि एक ईमानदार भक्त जो बहुत बुद्धिमान नहीं है, वह प्रभु से कुछ भौतिक लाभ मांग सकता है, लेकिन प्रभु, सर्वज्ञ होने के नाते, आम तौर पर भौतिक पुरस्कार नहीं देते हैं, बल्कि इसके विपरीत, जो भी भौतिक सुविधाएँ उनके भक्त द्वारा प्राप्त की जा रही हैं, वे उसे छीन लेते हैं, ताकि अंततः भक्त पूरी तरह से उनके प्रति समर्पण कर दे। दूसरे शब्दों में, भौतिक लाभ के रूप में आशीर्वाद की पेशकश भक्त के लिए कभी भी शुभ नहीं होती है। वेदों के बयान जो महान बलिदानों के बदले में स्वर्गीय ग्रहों को ऊंचाई प्रदान करते हैं, बस विचलित करने वाले हैं। इसलिए भगवद-गीता (2.42) में भगवान कहते हैं, याम इमां पुष्पितां वाचम प्रवदन्त्य विपश्चितः: पुरुषों का कम बुद्धिमान वर्ग (विपश्चितः), वेदों की फूलों वाली भाषा से आकर्षित होकर, भौतिक रूप से लाभान्वित होने के लिए फलदायी गतिविधियों में संलग्न होता है। इस प्रकार वे जीवन के बाद जीवन, विभिन्न शारीरिक रूपों में, बहुत, बहुत कठिन खोज जारी रखते हैं।
