श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  4.20.29 
भजन्त्यथ त्वामत एव साधवो
व्युदस्तमायागुणविभ्रमोदयम् ।
भवत्पदानुस्मरणाद‍ृते सतां
निमित्तमन्यद्भगवन्न विद्महे ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
जो महान संत हमेशा मुक्त रहते हैं, वे आपकी भक्ति में लीन रहते हैं, क्योंकि केवल भक्ति भाव से ही भौतिक अस्तित्व के मोह से मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। हे भगवान, मुक्त आत्माओं के लिए सि सिर्फ इसलिए आपके चरणों का सहारा लेने का कारण है क्योंकि ऐसी आत्माएं लगातार आपके चरणों का ध्यान धारण करती हैं।
 
जो महान संत हमेशा मुक्त रहते हैं, वे आपकी भक्ति में लीन रहते हैं, क्योंकि केवल भक्ति भाव से ही भौतिक अस्तित्व के मोह से मुक्ति का मार्ग प्राप्त होता है। हे भगवान, मुक्त आत्माओं के लिए सि सिर्फ इसलिए आपके चरणों का सहारा लेने का कारण है क्योंकि ऐसी आत्माएं लगातार आपके चरणों का ध्यान धारण करती हैं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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