जगज्जनन्यां जगदीश वैशसं
स्यादेव यत्कर्मणि न: समीहितम् ।
करोषि फल्ग्वप्युरु दीनवत्सल:
स्व एव धिष्ण्येऽभिरतस्य किं तया ॥ २८ ॥
अनुवाद
हे जगदीश्वर, लक्ष्मीजी विश्व की माता हैं, पर उनके प्रति सेवा में हस्तक्षेप करने और उसी पद पर कार्य करने से जिसके प्रति वे इतनी आसक्त हैं, वे मुझसे क्रुद्ध हो सकती हैं। फिर भी मुझे आशा है कि इस भ्रम के होते हुए भी आप मेरे पक्ष में रहेंगे, क्योंकि आप दीनवत्सल हैं और भक्त की तुच्छ सेवाओं को भी बहुत करके मानते हैं। अत: यदि वे रुष्ट भी हो जाएं तो आपको कोई हानि नहीं होगी, क्योंकि आप आत्मनिर्भर हैं और उनके बिना भी आपका काम चल सकता है।
O Lord of the world, though Lakṣmī is the mother of the universe, I think that by interfering in her service and by acting in the same position to which she is so attached, she may become angry with me. Yet I hope that in spite of this misapprehension you will take my side, for you are kind to the poor and consider even the most trivial services of the devotee to be of great value. Therefore, even if she becomes angry, you will not suffer any harm, for you are self-sufficient, and therefore your work can go on even without her.
तात्पर्य
माता लक्ष्मीजी, भाग्य की देवी, भगवान नारायण के कमल चरणों की हमेशा मालिश करने के लिए प्रसिद्ध हैं। वह एक आदर्श पत्नी हैं क्योंकि वह हर विवरण में भगवान नारायण की देखभाल करती हैं। वह न केवल उनके कमल चरणों की देखभाल करती हैं बल्कि भगवान के घरेलू मामलों का भी ध्यान रखती हैं। वह उनके लिए अच्छा भोजन बनाती हैं, उनके खाने के दौरान उन्हें हवा करती हैं, उनके चेहरे पर चंदन का लेप लगाती हैं और उनकी शय्या और बैठने की जगहों को सही क्रम में सेट करती हैं। इस तरह वह हमेशा भगवान की सेवा में लगी रहती हैं और शायद ही किसी अन्य भक्त के लिए उनकी दैनिक गतिविधियों में दखल देने का कोई अवसर होता है। इसलिए पृथु महाराज को लगभग यकीन था कि भाग्य की देवी की सेवा में उनका हस्तक्षेप उन्हें चिढ़ा देगा और वह उनसे नाराज़ हो जाएंगी। लेकिन ब्रह्मांड की माँ, माँ लक्ष्मी, पृथु महाराज जैसे एक तुच्छ भक्त पर क्यों क्रोधित होंगी? यह सब बहुत संभव नहीं था। फिर भी पृथु महाराज ने केवल अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा के लिए, भगवान से उनका साथ देने की अपील की। पृथु महाराज कर्म-कांड, या फलदायी गतिविधियों के अनुसार सामान्य वैदिक अनुष्ठानों और यज्ञों को करने में लगे हुए थे, लेकिन भगवान जो इतने दयालु और उदार हैं, पृथु महाराज को जीवन का सर्वोच्च पूर्णता स्तर, अर्थात् भक्ति सेवा देने के लिए तैयार थे। जब कोई व्यक्ति वैदिक अनुष्ठान और यज्ञ करता है, तो वह ऐसा स्वर्ग के ग्रहों तक खुद को ऊपर उठाने के लिए करता है। इस तरह के बलिदानों के माध्यम से कोई भी वापस घर, भगवान के पास वापस जाने के लिए योग्य नहीं बन सकता है। लेकिन भगवान इतने दयालु हैं कि वे एक छोटी सी तुच्छ सेवा स्वीकार करते हैं, और इसलिए विष्णु पुराण में कहा गया है कि वर्णाश्रम-धर्म के सिद्धांतों का पालन करके व्यक्ति सर्वोच्च भगवान को संतुष्ट कर सकता है। जब भगवान संतुष्ट हो जाते हैं, तो बलि देने वाले को भक्ति सेवा के मंच पर ऊपर उठाया जाता है। इसलिए पृथु महाराज को उम्मीद थी कि भगवान द्वारा लक्ष्मीजी से बड़ी उनकी तुच्छ सेवा को स्वीकार किया जाएगा। भाग्य की देवी को चंचला, "अस्थिर" कहा जाता है, क्योंकि वह बहुत बेचैन है और हमेशा आती-जाती रहती है। इसलिए पृथु महाराज ने संकेत दिया कि भले ही वह क्रोध के कारण चली जाएँ, लेकिन भगवान विष्णु को कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि वह आत्मनिर्भर हैं और लक्ष्मीजी की मदद के बिना कुछ भी और सब कुछ कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, जब गर्भोदकशायी विष्णु ने भगवान ब्रह्मा को अपनी नाभि से जन्म दिया, तो उन्होंने लक्ष्मी से कोई मदद नहीं ली, जो उनके पास बैठी थीं और उनके कमल चरणों की मालिश कर रही थीं। आम तौर पर यदि पुत्र पैदा करना हो तो पति पत्नी को गर्भवती करता है और नियत समय पर पुत्र का जन्म होता है। लेकिन भगवान ब्रह्मा के जन्म के मामले में, गर्भोदकशायी विष्णु ने लक्ष्मीजी को गर्भवती नहीं किया। स्वावलंबी होने के कारण, भगवान ने ब्रह्मा को अपनी नाभि से पैदा किया। इसलिए, पृथु महाराज को विश्वास था कि भाग्य की देवी भले ही उनसे नाराज़ हो जाएँ, लेकिन न तो भगवान को और न ही खुद को कोई नुकसान होगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥