यश: शिवं सुश्रव आर्यसङ्गमे
यदृच्छया चोपशृणोति ते सकृत् ।
कथं गुणज्ञो विरमेद्विना पशुं
श्रीर्यत्प्रवव्रे गुणसङ्ग्रहेच्छया ॥ २६ ॥
अनुवाद
हे अतीव गौरवशाली भगवान्, यदि कोई व्यक्ति पवित्र भक्तों की संगति में आपके महान कार्यों की एक बार भी प्रशंसा करता है, तो जब तक कि वह पशु के समान न हो, वह भक्तों की संगति नहीं छोड़ेगा, क्योंकि कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति इतना लापरवाह नहीं होगा कि वह उनका संग छोड़ दे। आपके नाम-कीर्तन और यशोगान को पूर्ण रूप से स्वीकार लक्ष्मी जी ने भी किया था, जो आपके अनंत कार्यकलापों और दिव्य महिमा को सुनने की इच्छुक रहती थीं।
O most glorious Lord, if one hears the glory of Your activities even once while in the company of pure devotees, unless he is like an animal, he will not leave the company of devotees, for no wise man will neglect to do so. The perfection of singing and hearing Your glories was even acknowledged by the goddess of wealth, Lakṣmī, who was desirous of hearing Your endless activities and transcendental glories.
तात्पर्य
संसार में भक्तों का संग (आर्यसंङ्ग) ही सबसे महत्वपूर्ण तत्व है। आर्य शब्द का अर्थ है- जो आध्यात्मिक रूप में आगे बढ़ रहे हों। मानवजाति के इतिहास में, आर्य परिवार को दुनिया में सबसे ऊँचा समुदाय माना जाता है क्योंकि ये वैदिक सभ्यता को अपनाते हैं। आर्य परिवार पूरे विश्व में फैला हुआ है और इन्हें इंडो-आर्य के रूप में जाना जाता है। प्रागैतिहासिक काल में, आर्य परिवार के सभी सदस्य वैदिक सिद्धांतों का पालन करते थे, और इसलिए वे आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़े। राजर्षि के रूप में जाने जाने वाले राजा बतौर क्षत्रिय या नागरिकों के रक्षक, बहुत ही अच्छे शिक्षित थे और आध्यात्मिक जीवन में इतने आगे बढ़े थे कि नागरिकों के लिए किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं थी। आर्य परिवार द्वारा भगवान का महिमामंडन बहुत ही सराहनीय हो सकता है। हालाँकि दूसरों के लिए कोई रोक नहीं है, आर्य परिवार के सदस्य आध्यात्मिक जीवन के सार को बहुत जल्दी समझ लेते हैं। ऐसा कैसे है कि हमें यूरोपीय और अमेरिकियों के बीच कृष्ण चेतना को फैलाना बहुत आसान लग रहा है? इतिहास इस बात की गवाही देता है कि अमेरिकियों और यूरोपीय लोगों ने अपनी क्षमता साबित की जब वे उपनिवेशवाद का विस्तार करने के लिए उत्सुक थे, लेकिन वर्तमान समय में, भौतिक विज्ञान की उन्नति से दूषित होने के कारण, उनके बेटे और पोते दुष्ट हो रहे हैं। यह उनकी मूल आध्यात्मिक संस्कृति को खोने के कारण है, जो वैदिक सभ्यता है। वर्तमान में, आर्य परिवार के ये वंशज इस कृष्ण चेतना आंदोलन को बहुत गंभीरता से ले रहे हैं। अन्य जो उनके साथ जुड़ रहे हैं और शुद्ध भक्तों के होंठों से हरे कृष्ण महामंत्र का जाप सुन रहे हैं, वे भी पारलौकिक कंपन से मुग्ध हो रहे हैं। पारलौकिक कंपन आर्यों के बीच जाप किए जाने पर बहुत प्रभावी होते हैं, लेकिन भले ही कोई आर्य परिवार से संबंधित न हो, वह केवल मंत्र सुनकर वैष्णव बन जाएगा क्योंकि उस कंपन का सभी पर बहुत प्रभाव है। महाराजा पृथु बताते हैं कि भाग्य की देवी, जो भगवान नारायण की निरंतर साथी है, वह भी विशेष रूप से भगवान की महिमा के बारे में सुनना चाहती थी, और गोपियों, जो शुद्ध भक्त हैं, के संग के लिए, भाग्य की देवी, लक्ष्मी ने गंभीर तपस्याएँ कीं। अवैयक्तिकवादी पूछ सकते हैं कि कोई भगवान के अस्तित्व में विलीन होने या कैवल्य, मुक्ति के लिए रुकने और कोशिश करने के बजाय लगातार इतने वर्षों तक हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करने से क्यों परेशान होता है। उत्तर में, महाराजा पृथु कहते हैं कि इस जप का आकर्षण इतना महान है कि कोई भी इस प्रक्रिया को नहीं छोड़ सकता जब तक कि वह पशु न हो। यह तब भी है जब कोई संयोग से इस पारलौकिक कंपन के संपर्क में आता है। पृथु महाराज इस संबंध में बहुत जोर देते हैं - केवल एक जानवर ही हरे कृष्ण का जाप करने का अभ्यास छोड़ सकता है। जो पशु नहीं हैं बल्कि वास्तव में बुद्धिमान, उन्नत, मानवीय, सभ्य मनुष्य हैं, वे हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे/हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का लगातार जाप करने का यह अभ्यास नहीं छोड़ सकते।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥