श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  4.20.24 
न कामये नाथ तदप्यहं क्‍वचिन्
न यत्र युष्मच्चरणाम्बुजासव: ।
महत्तमान्तर्हृदयान्मुखच्युतो
विधत्स्व कर्णायुतमेष मे वर: ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, मैं आपसे तादात्म्य का वरदान नहीं माँगता, क्योंकि इसमें आपके चरण-कमलों के अमृत रस का आनंद नहीं है। मैं तो दस लाख कान प्राप्त करने का वरदान माँगता हूँ, जिससे मैं आपके शुद्ध भक्तों के मुँह से आपके चरण-कमलों की महिमा का गान सुन सकूँ।
 
O Lord, I do not ask for the boon of identification with You, for that does not contain the nectar of Your feet. I ask for the boon of obtaining ten million ears so that I may hear the glories of Your feet sung by the mouths of Your pure devotees.
तात्पर्य
पिछले श्लोक में महाराज पृथु ने भगवान को कैवल्य-पति संबोधित किया है, जो उनके अस्तित्व में विलीन होने की मुक्ति का स्वामी हैं। इसका यह अर्थ नहीं है कि वह कैवल्य मुक्ति के लिए उत्सुक थे। यह इस श्लोक में स्पष्ट किया गया है: "मेरे प्रिय भगवान, मुझे ऐसा वरदान नहीं चाहिए।" महाराज पृथु भगवान के कमल चरणों की महिमा सुनने के लिए एक लाख कान चाहते थे। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया है कि भगवान की महिमा शुद्ध भक्तों के मुख से निकलनी चाहिए, जो अपने दिल की गहराइयों से बोलते हैं। श्रीमद-भागवतम (1.1.3) की शुरुआत में कहा गया है, शुका-मुखाद अमृता-द्रवा-संयुतम्: श्रीमद-भागवतम का अमृत इसलिए अधिक स्वादिष्ट हो गया क्योंकि यह श्रील शुकादेव गोस्वामी के मुंह से निकला था। कोई सोच सकता है कि भगवान की ये महिमा कहीं भी सुनी जा सकती है, भक्तों या गैर-भक्तों के मुंह से, लेकिन यहाँ यह विशेष रूप से उल्लेख किया गया है कि भगवान की महिमा शुद्ध भक्तों के मुंह से निकलनी चाहिए। श्री सनातन गोस्वामी ने गैर-भक्त के मुंह से सुनने पर सख्त मनाही की है। श्रीमद-भागवतम के कई पेशेवर पाठक हैं जो बहुत ही अलंकृत ढंग से कथाएँ बोलते हैं, लेकिन एक शुद्ध भक्त उन्हें सुनना पसंद नहीं करता है क्योंकि भगवान का ऐसा महिमामंडन केवल भौतिक ध्वनि का एक कंपन है। लेकिन जब शुद्ध भक्त के मुंह से सुना जाता है, तो भगवान का महिमामंडन तुरंत प्रभावी होता है। सतां प्रसंगान मम वीर्य-संविदः (भागवत 3.25.25) शब्दों का अर्थ है कि भगवान का महिमामंडन एक शुद्ध भक्त के मुंह से निकला होने पर शक्तिशाली होता है। भगवान के पूरे ब्रह्मांड में असंख्य भक्त हैं, और वे अनादि काल से और असीमित समय से भगवान का महिमामंडन कर रहे हैं। लेकिन फिर भी वे भगवान की महिमा का पूरी तरह से वर्णन नहीं कर सकते हैं। इसलिए पृथु महाराज असंख्य कान चाहते थे, जैसा कि रूप गोस्वामी भी भगवान के महिमामंडन का जाप करने और सुनने के लिए लाखों कान और लाखों जीभ चाहते थे। दूसरे शब्दों में, यदि हमारे कान हमेशा भगवान के महिमामंडन को सुनने में लगे रहते हैं, तो मायावाद दर्शन को सुनने की कोई गुंजाइश नहीं होगी, जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए अभिशाप है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा कि यदि कोई भी मायावादी दार्शनिक से भगवान की गतिविधियों के बारे में उपदेश सुनता है, भले ही वह वैदिक साहित्य का वर्णन हो, तो वह अंततः बर्बाद हो जाता है। मायावाद दर्शन को सुनने से जीवन की आध्यात्मिक पूर्णता की गंतव्य तक नहीं पहुँचा जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)