श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.20.23 
पृथुरुवाच
वरान्विभो त्वद्वरदेश्वराद् बुध:
कथं वृणीते गुणविक्रियात्मनाम् ।
ये नारकाणामपि सन्ति देहिनां
तानीश कैवल्यपते वृणे न च ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु, आप वर देने वाले देवताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं। अतः कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति आपसे ऐसे वरदान क्यों माँगेगा जो प्रकृति के गुणों से मोहित जीवों के लिए हैं? ऐसे वरदान तो नरक में वास करने वाले जीवों को भी अपने जीवनकाल में स्वतः ही प्राप्त होते रहते हैं। हे भगवान, आप निश्चित रूप से अपने साथ तादात्म्य प्रदान कर सकते हैं, किन्तु मैं ऐसा वरदान नहीं चाहता।
 
O Lord, You are the best of the gods who give boons. So why would any intelligent person ask You for such boons which are meant for the souls bewildered by the modes of nature? Such boons are automatically received by the souls residing in hell during their lifetime. O Lord, You can certainly grant me identification with You, but I do not want such a boon.
तात्पर्य
किसी व्यक्ति की मांगों के अनुसार आशीर्वाद के विभिन्न प्रकार हैं। कर्मियों के लिए सबसे अच्छे आशीर्वाद उच्च ग्रह प्रणालियों में प्रचार करना है, जहां जीवन की अवधि बहुत लंबी है और जीवन स्तर और खुशी बहुत अधिक है। अन्य भी हैं, अर्थात् ज्ञानी और योगी, जो प्रभु के अस्तित्व में विलय होने का आशीर्वाद चाहते हैं। इसे कैवल्य कहा जाता है। इसलिए प्रभु को कैवल्य-पति, कैवल्य के नाम से जाने जाने वाले आशीर्वाद के स्वामी या स्वामी के रूप में संबोधित किया जाता है। लेकिन भक्त प्रभु से एक अलग प्रकार का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। भक्त स्वर्गीय ग्रहों के लिए या प्रभु के अस्तित्व में विलय होने के लिए उत्सुक नहीं हैं। भक्तों के अनुसार, कैवल्य या प्रभु के अस्तित्व में विलय होना नरक के समान अच्छा माना जाता है। नरक शब्द का अर्थ है "नरक"। इसी तरह, इस भौतिक दुनिया में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को नारक कहा जाता है क्योंकि यह भौतिक अस्तित्व स्वयं जीवन की नारकीय स्थिति के रूप में जाना जाता है। हालाँकि, पृथु महाराज ने व्यक्त किया कि उनकी कर्मियों द्वारा वांछित आशीर्वाद में न तो रुचि थी और न ही ज्ञानी और योगियों द्वारा वांछित। भगवान चैतन्य के एक महान भक्त श्रील प्रबोधानंद सरस्वती प्रभु ने बताया कि कैवल्य जीवन की नारकीय स्थिति से बेहतर नहीं है, और स्वर्गीय ग्रहों की प्रसन्नताओं के रूप में, वे तथ्यात्मक रूप से विल-ओ-द-विस्प, या फैंटमस्मगोरिया हैं। भक्त उन्हें नहीं चाहते। भक्त भगवान ब्रह्मा या भगवान शिव द्वारा धारण किए गए पदों की परवाह भी नहीं करते हैं, और न ही कोई भक्त भगवान विष्णु के साथ बराबर बनने की इच्छा करता है। प्रभु के एक शुद्ध भक्त के रूप में, पृथु महाराज ने अपनी स्थिति बहुत स्पष्ट की।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)