श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  4.20.21 
स आदिराजो रचिताञ्जलिर्हरिं
विलोकितुं नाशकदश्रुलोचन: ।
न किञ्चनोवाच स बाष्पविक्लवो
हृदोपगुह्यामुमधादवस्थित: ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
राजा महाराज पृथु की आँखों में आँसू थे और उनकी वाणी अवरुद्ध हो गई थी। इसलिए वह न तो भगवान को ठीक से देख सके और न ही उन्हें संबोधित करके कुछ कह सके। उन्होंने केवल अपने हृदय में भगवान को आलिंगन किया और हाथ जोड़े हुए उसी तरह खड़े रहे।
 
With tears filling his eyes and his speech being choked, King Prithu could neither see the Lord properly nor could he address the Lord and say anything. He simply embraced the Lord within his heart and stood like that with folded hands.
तात्पर्य
ठीक उसी तरह, जिस तरह ब्रह्म-संहिता में कृष्ण को आदि-पुरुष, मूल व्यक्तित्व के रूप में संबोधित किया गया है, इसलिए राजा पृथु भी प्रभु के अधिकारों वाले अवतार होने के नाते, इस छंद में आदि-राजः, मूल या आदर्श राजा के रूप में संदर्भित हैं। वह एक महान भक्त और साथ ही एक महान नायक थे, जिन्होंने अपने राज्य में सभी अवांछित तत्वों पर विजय प्राप्त की थी। वह इतने शक्तिशाली थे कि युद्ध में स्वर्ग के राजा इंद्र के बराबर थे। उन्होंने अपने नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की और उन्हें पवित्र गतिविधियों और प्रभु के प्रति भक्ति में व्यस्त रखा। उन्होंने नागरिकों से संरक्षण प्राप्त करने में सक्षम हुए बिना उनसे एक भी कर नहीं वसूला था, और उन्हें सभी आपदाओं से सुरक्षा प्रदान की। जीवन की सबसे बड़ी आपदा ईश्वरविहीन होना और इसलिए पापमयी होना है। यदि राज्य प्रमुख या राजा नागरिकों को निषिद्ध यौन जीवन, नशे की हालत, मांसाहार और जुआ खेलने में शामिल होकर पाप करने की अनुमति देता है, तो राजा जिम्मेदार होता है, और उसे नागरिकों के पापमय जीवन के परिणामी प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि वह उन पर अनावश्यक रूप से कर लगाता है। ये एक शासक शक्ति के लिए सिद्धांत हैं, और क्योंकि महाराज पृथु ने एक शासक प्रमुख के लिए सभी सिद्धांतों का पालन किया, इसलिए उन्हें यहां आदि-राजः के रूप में संदर्भित किया गया है। महाराज पृथु जैसे एक जिम्मेदार राजा भी प्रथम श्रेणी के शुद्ध भक्त बन सकते हैं। हम राजा पृथु के व्यवहार से स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि कैसे वह शुद्ध भक्ति सेवा में, बाहरी और आंतरिक दोनों रूप से, उन्मादपूर्ण हो गए थे। बस आज ही देखिए, हमें आज बॉम्बे के समाचार पत्रों में, कि सरकार अपने निषेध कानूनों को निरस्त करने जा रही है। जब से गांधी के असहयोग आंदोलन की शुरुआत हुई है, बॉम्बे को सूखा रखा गया है और उसने अपने नागरिकों को शराब पीने की इजाजत नहीं दी है। लेकिन दुर्भाग्य से नागरिक इतने चतुर हैं कि उन्होंने शराब की अवैध भट्टी को बढ़ा दिया है, और हालांकि सार्वजनिक रूप से दुकानों में शराब नहीं बेची जा रही है, लेकिन शराब को सार्वजनिक शौचालयों और इसी तरह के अन्य असामान्य स्थानों पर बेचा जा रहा है। ऐसी अवैध तस्करी को रोकने में असमर्थ, सरकार ने शराब का निर्माण सस्ती कीमतों पर करने का फैसला किया है ताकि लोगों को सार्वजनिक शौचालयों में खरीदने के बजाय सरकार से नशे की आपूर्ति सीधे मिल सके। सरकार नागरिकों के दिलों को पापमय जीवन जीने से रोकने में विफल रही, इसलिए खजाने को बढ़ाने के लिए अपने करों को खोने के बजाय, उन्होंने नागरिकों को शराब की आपूर्ति करने के लिए निर्माण करने का फैसला किया है जो इसका काल करते हैं। इस प्रकार की सरकार पापमय जीवन के परिणामी कार्यों, अर्थात् युद्ध, महामारी, अकाल, भूकंप और ऐसी ही अन्य गड़बड़ी को रोक नहीं सकती। प्रकृति का नियम यह है कि जैसे ही ईश्वर के कानून (जैसा कि भगवद्-गीता में धर्मस्य ग्लानिः के रूप में वर्णित है, या प्रकृति या ईश्वर के नियमों की अवज्ञा) के संबंध में विसंगतियाँ होती हैं, अचानक युद्ध के भयंकर दंड मिलेगा। हमने हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध का अनुभव किया है। चौदह दिनों के भीतर पुरुषों और धन की भारी हानि हुई है, और पूरी दुनिया में आक्रामकता हुई है। ये पापमय जीवन की प्रतिक्रियाएँ हैं। कृष्ण चेतना आंदोलन लोगों को शुद्ध और पूर्ण बनाने के लिए है। यदि हम भगवद् गीता में वर्णित (नष्ट-प्रायेष-अभद्रेशु) के रूप में भी आंशिक रूप से शुद्ध हो जाते हैं, तो नागरिकों के भौतिक रोग, वासना और लालच कम हो जाएंगे। यह केवल श्रीमद्-भगवद्-गीता, या कृष्ण चेतना के शुद्ध संदेश के प्रसारण से संभव हो सकता है। बड़ी व्यावसायिक और औद्योगिक फर्मों ने कई हजार रुपये रक्षा निधि में दिए हैं जो बारूद के रूप में पैसा जलाती है, लेकिन दुर्भाग्य से, यदि उन्हें कृष्ण चेतना आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए उदारतापूर्वक योगदान देने के लिए कहा जाता है, तो वे अनिच्छुक होते हैं। परिस्थितियों को देखते हुए, दुनिया समय-समय पर ऐसे उभार और युद्ध के प्रकोप से पीड़ित होगी, जो कृष्ण चेतना नहीं होने का परिणाम है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)