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श्लोक 4.20.19  |
भगवानथ विश्वात्मा पृथुनोपहृतार्हण: ।
समुज्जिहानया भक्त्या गृहीतचरणाम्बुज: ॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| भगवान् ने राजा पृथु पर अत्यंत कृपा की थी, राजा पृथु ने भी भगवान् के चरण-कमलों की प्रभूत पूजा की। साथ ही, भगवान् के चरण-कमलों की आराधना करते हुए राजा पृथु का भक्ति में आनंद क्रमश: बढ़ता गया। |
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| भगवान् ने राजा पृथु पर अत्यंत कृपा की थी, राजा पृथु ने भी भगवान् के चरण-कमलों की प्रभूत पूजा की। साथ ही, भगवान् के चरण-कमलों की आराधना करते हुए राजा पृथु का भक्ति में आनंद क्रमश: बढ़ता गया। |
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