भगवान विष्णु ने महाराज पृथु को सलाह दी कि एक राजा को अपना राज्य और प्रजा, या नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी त्यागने और मोक्ष के लिए हिमालय चले जाने के लिए प्रेरित नहीं किया जाता है। वह अपने शाही कर्तव्यों का पालन करते हुए मुक्ति प्राप्त कर सकता है। शाही कर्तव्य या राष्ट्र प्रमुख का कर्तव्य यह देखना है कि प्रजा, या लोगों का सामान्य समूह, आध्यात्मिक मुक्ति के लिए अपने संबंधित कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य को एक राजा या राष्ट्र प्रमुख की आवश्यकता नहीं होती है जो प्रजा की गतिविधियों के प्रति उदासीन हो। आधुनिक राज्य में सरकार के पास प्रजा के कर्तव्यों के संचालन के लिए कई नियम और विनियम हैं, लेकिन सरकार यह देखने में विफल रहती है कि नागरिक आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नति करें। यदि सरकार इस मामले में लापरवाह है, तो नागरिक बिना किसी ईश्वर बोध या आध्यात्मिक जीवन के खोखले ढंग से कार्य करेंगे और इस प्रकार पापपूर्ण गतिविधियों में उलझ जाएँगे।
एक कार्यकारी प्रमुख को लोगों के कल्याण के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए जबकि वह केवल कर जमा करता रहता है। राजा का असली कर्तव्य यह देखना है कि नागरिक धीरे-धीरे पूरी तरह से कृष्णभावना से भरपूर हो जाएँ। कृष्णभावना का अर्थ है सभी पापपूर्ण गतिविधियों से पूरी तरह मुक्त होना। राज्य में जिस दिन पापपूर्ण गतिविधियों का पूर्ण उन्मूलन हो जाएगा, तब कोई युद्ध, महामारी, अकाल या प्राकृतिक आपदा नहीं होगी। यह वास्तव में महाराज युधिष्ठिर के शासनकाल के दौरान प्रचलित था। यदि कोई राजा या सरकार का मुखिया नागरिकों को कृष्णभावना से ओतप्रोत करने में सक्षम है, तो वह जनसमूह पर शासन करने के योग्य है; अन्यथा, उसे कर लगाने का कोई अधिकार नहीं है। यदि राजा नागरिकों के आध्यात्मिक हितों की देखभाल करता है, तो वह बिना किसी कठिनाई के कर लगा सकता है। इस तरह इस जीवन में प्रजा और राजा दोनों सुखी होंगे, और अगले जीवन में राजा नागरिकों की पवित्र गतिविधियों में से एक छठे हिस्से का साझा करने में सक्षम होगा। अन्यथा, पापी नागरिकों पर कर लगाने से, उसे उनकी पापपूर्ण गतिविधियों के परिणाम साझा करने होंगे।
यही सिद्धांत माता-पिता और आध्यात्मिक गुरुओं पर भी लागू किया जा सकता है। यदि माता-पिता केवल बिल्लियों और कुत्तों की तरह बच्चों को जन्म देते हैं, लेकिन अपने बच्चों को आसन्न मृत्यु से नहीं बचा सकते हैं, तो वे अपने पशुवत बच्चों की गतिविधियों के लिए जिम्मेदार हो जाते हैं। हाल ही में, ऐसे बच्चे हिप्पी में बदल रहे हैं। इसी तरह, यदि कोई अध्यात्मिक गुरु अपने शिष्यों को पापपूर्ण गतिविधियों से मुक्त करने के लिए निर्देशित नहीं कर सकता है, तो वह उनके पापपूर्ण कार्यों के लिए जिम्मेदार हो जाता है। प्रकृति के ये सूक्ष्म नियम समाज के वर्तमान नेताओं को ज्ञात नहीं हैं। चूंकि समाज के नेताओं के पास ज्ञान का भंडार बहुत कम है और सामान्य नागरिक दुष्ट और चोर हैं, इसलिए मानव समाज के लिए कोई शुभ स्थिति नहीं हो सकती है। वर्तमान समय में पूरी दुनिया राज्य और नागरिकों के ऐसे असंगत संयोजन से भरी हुई है, और इसलिए ऐसी सामाजिक स्थितियों के अपरिहार्य परिणाम के रूप में निरंतर तनाव, युद्ध और चिंता है।
