श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  4.20.14 
श्रेय: प्रजापालनमेव राज्ञो
यत्साम्पराये सुकृतात् षष्ठमंशम् ।
हर्तान्यथा हृतपुण्य: प्रजाना-
मरक्षिता करहारोऽघमत्ति ॥ १४ ॥
 
 
अनुवाद
राज्य के सभी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करना राजा का निर्दिष्ट धर्म है। ऐसा करके राजा को अगले जन्म में प्रजा के पुण्यों का छठा भाग मिलता है। लेकिन जो राजा या शासक प्रजा से केवल कर वसूलता है और नागरिकों को उचित सुरक्षा नहीं देता, तो उसके पुण्य प्रजा छीन लेती है और सुरक्षा न देने के बदले में उसे प्रजा के पापों को भोगना पड़ता है।
 
The specified duty of the king is to provide security to all the citizens of the state. By doing this, the king gets one-sixth of the virtues of the subjects in the next life. But if a king or administrator only collects taxes from the subjects and does not provide proper security to the citizens, then the subjects snatch away his virtues and in return for not providing security, he has to bear the sins of the subjects.
तात्पर्य
सवाल यहाँ उठ सकता है कि अगर हर कोई मोक्ष प्राप्ति के लिए आध्यात्मिक गतिविधियों में लगा रहे और सांसारिक गतिविधियों के प्रति उदासीन हो जाए, तो फिर चीजें जैसी हैं, वैसी ही कैसे चलती रह सकती हैं? और अगर चीजें जैसी होनी चाहिए वैसी ही चलनी हैं, तो किसी भी राष्ट्र के नेता ऐसी गतिविधियों के प्रति उदासीन कैसे रह सकते हैं? इस सवाल के जवाब में, यहाँ "श्रेयः", "शुभ" शब्द का उपयोग किया गया है। सर्वोच्च ईश्वर व्यक्तित्व द्वारा समाज में गतिविधियों का विभाजन नेत्रहीन या संयोगवश नहीं बनाया गया था, जैसा कि मूर्ख लोग कहते हैं। ब्राह्मणों को अपना कर्तव्य ठीक से करना चाहिए, और क्षत्रिय, वैश्य और यहाँ तक ​​कि शूद्रों को भी ऐसा ही करना चाहिए। और उनमें से हर एक जीवन की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त कर सकता है - इस भौतिक बंधन से मुक्ति। भगवद-गीता (18.45) में इसकी पुष्टि की गई है। स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः: "अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करके, कोई भी सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त कर सकता है।"

भगवान विष्णु ने महाराज पृथु को सलाह दी कि एक राजा को अपना राज्य और प्रजा, या नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी त्यागने और मोक्ष के लिए हिमालय चले जाने के लिए प्रेरित नहीं किया जाता है। वह अपने शाही कर्तव्यों का पालन करते हुए मुक्ति प्राप्त कर सकता है। शाही कर्तव्य या राष्ट्र प्रमुख का कर्तव्य यह देखना है कि प्रजा, या लोगों का सामान्य समूह, आध्यात्मिक मुक्ति के लिए अपने संबंधित कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं। एक धर्मनिरपेक्ष राज्य को एक राजा या राष्ट्र प्रमुख की आवश्यकता नहीं होती है जो प्रजा की गतिविधियों के प्रति उदासीन हो। आधुनिक राज्य में सरकार के पास प्रजा के कर्तव्यों के संचालन के लिए कई नियम और विनियम हैं, लेकिन सरकार यह देखने में विफल रहती है कि नागरिक आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नति करें। यदि सरकार इस मामले में लापरवाह है, तो नागरिक बिना किसी ईश्वर बोध या आध्यात्मिक जीवन के खोखले ढंग से कार्य करेंगे और इस प्रकार पापपूर्ण गतिविधियों में उलझ जाएँगे।

एक कार्यकारी प्रमुख को लोगों के कल्याण के प्रति उदासीन नहीं होना चाहिए जबकि वह केवल कर जमा करता रहता है। राजा का असली कर्तव्य यह देखना है कि नागरिक धीरे-धीरे पूरी तरह से कृष्णभावना से भरपूर हो जाएँ। कृष्णभावना का अर्थ है सभी पापपूर्ण गतिविधियों से पूरी तरह मुक्त होना। राज्य में जिस दिन पापपूर्ण गतिविधियों का पूर्ण उन्मूलन हो जाएगा, तब कोई युद्ध, महामारी, अकाल या प्राकृतिक आपदा नहीं होगी। यह वास्तव में महाराज युधिष्ठिर के शासनकाल के दौरान प्रचलित था। यदि कोई राजा या सरकार का मुखिया नागरिकों को कृष्णभावना से ओतप्रोत करने में सक्षम है, तो वह जनसमूह पर शासन करने के योग्य है; अन्यथा, उसे कर लगाने का कोई अधिकार नहीं है। यदि राजा नागरिकों के आध्यात्मिक हितों की देखभाल करता है, तो वह बिना किसी कठिनाई के कर लगा सकता है। इस तरह इस जीवन में प्रजा और राजा दोनों सुखी होंगे, और अगले जीवन में राजा नागरिकों की पवित्र गतिविधियों में से एक छठे हिस्से का साझा करने में सक्षम होगा। अन्यथा, पापी नागरिकों पर कर लगाने से, उसे उनकी पापपूर्ण गतिविधियों के परिणाम साझा करने होंगे।

यही सिद्धांत माता-पिता और आध्यात्मिक गुरुओं पर भी लागू किया जा सकता है। यदि माता-पिता केवल बिल्लियों और कुत्तों की तरह बच्चों को जन्म देते हैं, लेकिन अपने बच्चों को आसन्न मृत्यु से नहीं बचा सकते हैं, तो वे अपने पशुवत बच्चों की गतिविधियों के लिए जिम्मेदार हो जाते हैं। हाल ही में, ऐसे बच्चे हिप्पी में बदल रहे हैं। इसी तरह, यदि कोई अध्यात्मिक गुरु अपने शिष्यों को पापपूर्ण गतिविधियों से मुक्त करने के लिए निर्देशित नहीं कर सकता है, तो वह उनके पापपूर्ण कार्यों के लिए जिम्मेदार हो जाता है। प्रकृति के ये सूक्ष्म नियम समाज के वर्तमान नेताओं को ज्ञात नहीं हैं। चूंकि समाज के नेताओं के पास ज्ञान का भंडार बहुत कम है और सामान्य नागरिक दुष्ट और चोर हैं, इसलिए मानव समाज के लिए कोई शुभ स्थिति नहीं हो सकती है। वर्तमान समय में पूरी दुनिया राज्य और नागरिकों के ऐसे असंगत संयोजन से भरी हुई है, और इसलिए ऐसी सामाजिक स्थितियों के अपरिहार्य परिणाम के रूप में निरंतर तनाव, युद्ध और चिंता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)