श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 20: महाराज पृथु के यज्ञस्थल में भगवान् विष्णु का प्राकट्य  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  4.20.11 
उदासीनमिवाध्यक्षं द्रव्यज्ञानक्रियात्मनाम् ।
कूटस्थमिममात्मानं यो वेदाप्नोति शोभनम् ॥ ११ ॥
 
 
अनुवाद
जो कोई भी यह जानता है कि पांच स्थूल तत्वों, कर्मेन्द्रियों, ज्ञानेन्द्रियों और मन से निर्मित यह भौतिक शरीर केवल स्थिर आत्मा द्वारा संचालित होता है, वह भौतिक बंधन से मुक्ति पाने योग्य है।
 
Anyone who knows that the body, composed of the five elements, the organs of action, the senses and the mind, is operated only by the immobile soul, is capable of being liberated from material bondage.
तात्पर्य
इस श्‍लोक में बताया गया है कि मनुष्‍य भौतिक बंधन से कैसे मुक्‍त हो सकता है। पहला बिंदु यह है कि मनुष्‍य को समझना चाहिए कि उसकी आत्‍मा उसके शरीर से अलग है। आत्‍मा को देही कहते हैं, यानी शरीर का धारण करने वाला, और भौतिक शरीर को देह कहते हैं, यानी आत्‍मा का साकार रूप। शरीर हर पल बदलता रहता है, लेकिन आत्‍मा स्थिर रहती है; इसलिए आत्‍मा को कूट-स्‍थम कहा गया है। शरीर का परिवर्तन प्रकृति के तीनों गुणों की प्रतिक्रिया से होता है। जिसने आत्‍मा की स्थिर स्थिति को समझ लिया है, उसे प्रकृति के गुणों के आने-जाने से उत्‍पन्‍न होनी वाली सुख और दुख की अंत:क्रियाओं से परेशान नहीं होना चाहिए। भगवद गीता में भी भगवान कृष्‍ण यही सलाह देते हैं कि चूँकि सुख और दुख प्रकृति के गुणों का शरीर पर होने वाली अंत:क्रिया से आते हैं और जाते हैं, मनुष्‍य को ऐसी बाहरी हरकतों से परेशान नहीं होना चाहिए। हालाँकि कभी-कभी मनुष्‍य ऐसी बाहरी हरकतों में तल्‍लीन हो जाता है, लेकिन उसे उन्‍हें सहना सीखना होगा। जीव को हर समय बाहरी शरीर कीक्रिया-प्रतिक्रिया के प्रति उदासीन रहना चाहिए। भगवान कृष्‍ण भगवद गीता में कहते हैं कि gross भौतिक तत्‍वों (पृथ्‍वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) और सूक्ष्‍म तत्‍वों (मन, बुद्धि और अहंकार) से बना शरीर आत्‍मा से पूरी तरह से अलग है। इसलिए मनुष्‍य को इन आठ gross और सूक्ष्‍म भौतिक तत्‍वों की क्रिया-प्रतिक्रिया से परेशान नहीं होना चाहिए। इस उदासीनता की अवस्‍था को पाने की व्‍यवहारिक प्रक्रिया भक्ति करना है। केवल वही मनुष्‍य बाहरी शरीर की क्रिया-प्रतिक्रिया के प्रति उदासीन हो सकता है, जो लगातार चौबीसों घंटे भक्ति में लगा रहे। जब मनुष्‍य किसी खास विचार में तल्‍लीन हो जाता है, वह किसी भी बाहरी गतिविधि को सुनता या देखता नहीं, हालाँकि वे उसके सामने ही हो रही हों। इसी तरह, जो लोग भक्ति में पूरी तरह से लीन रहते हैं वे इस बात की परवाह नहीं करते कि बाहरी शरीर के साथ क्‍या हो रहा है। उस स्थिति को समाधि कहते हैं। जो वास्‍तव में समाधि की अवस्‍था में होता है, वह श्रेष्‍ठ योगी माना जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)