श्रूयतां ब्रह्मर्षयो मे सहदेवा: सहाग्नय: ।
साधूनां ब्रुवतो वृत्तं नाज्ञानान्न च मत्सरात् ॥ ९ ॥
अनुवाद
हे सभी उपस्थित ऋषियों, ब्राह्मणों और अग्नि देवताओं, ध्यानपूर्वक सुनें क्योंकि मैं शिष्टाचार के विषय में बोल रहा हूँ। मैं अज्ञानता या ईर्ष्या से नहीं कह रहा हूँ।
O all the sages, Brahmins and Agnidevas present here, listen carefully as I am speaking about etiquette. I am not speaking out of ignorance or jealousy.
तात्पर्य
भगवान शिव के ख़िलाफ़ बोलते हुए, दक्ष ने एक चालबाज़ तरीके से यह कहते हुए असेंबली को शांत करने का प्रयास किया कि वह सज्जन व्यक्तियों के शिष्टाचार के बारे में बात करने जा रहे थे, हालाँकि स्वाभाविक रूप से यह कुछ असभ्य अमीरों को प्रभावित कर सकता है और असेंबली नाख़ुश हो सकती है क्योंकि वे यह नहीं चाहते थे कि असभ्य व्यक्ति भी अपमानित हों। दूसरे शब्दों में, वह इस बात को पूरी तरह से जानता था कि वह शिव के निर्मल चरित्र के बावजूद उनके ख़िलाफ़ बोल रहा था। जहाँ तक ईर्ष्या का सवाल है, तो वह शुरू से ही भगवान शिव से ईर्ष्या करता था; इसलिए वह अपनी ख़ुद की ईर्ष्या को नहीं समझ सका। हालाँकि उसने एक अज्ञानी व्यक्ति की तरह बात की, लेकिन वह अपने बयानों को यह कहकर ढँकना चाहता था कि वह ढिठाई और ईर्ष्यापूर्ण कारणों से नहीं बोल रहा था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥