श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.2.35 
आप्लुत्यावभृथं यत्र गङ्गा यमुनयान्विता ।
विरजेनात्मना सर्वे स्वं स्वं धाम ययुस्तत: ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
प्रिय विदुर, धनुष-बाण धारण करने वाले, सभी देवताओं ने यज्ञ समाप्त करने के बाद गंगा और यमुना के संगम पर स्नान किया। इस तरह के स्नान को अवभृथ स्नान कहा जाता है। इस प्रकार मन से पवित्र होकर वे अपने-अपने निवास स्थानों के लिए प्रस्थान कर गए।
 
प्रिय विदुर, धनुष-बाण धारण करने वाले, सभी देवताओं ने यज्ञ समाप्त करने के बाद गंगा और यमुना के संगम पर स्नान किया। इस तरह के स्नान को अवभृथ स्नान कहा जाता है। इस प्रकार मन से पवित्र होकर वे अपने-अपने निवास स्थानों के लिए प्रस्थान कर गए।
 
इस प्रकार श्रीमद् भागवतम के स्कन्ध चार के अंतर्गत दूसरा अध्याय समाप्त होता है ।
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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