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श्लोक 4.2.33  |
मैत्रेय उवाच
तस्यैवं वदत: शापं भृगो: स भगवान् भव: ।
निश्चक्राम तत: किञ्चिद्विमना इव सानुग: ॥ ३३ ॥ |
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| अनुवाद |
| मैत्रेय मुनि ने कहा : जब शिवजी के अनुयायियों तथा दक्ष और भृगु के समर्थकों के बीच शाप-प्रतिशाप का दौर चल रहा था, तो शिवजी बहुत ही उदास हो गए और बिना कुछ बोले अपने शिष्यों के साथ यज्ञस्थल छोड़कर चले गए। |
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| मैत्रेय मुनि ने कहा : जब शिवजी के अनुयायियों तथा दक्ष और भृगु के समर्थकों के बीच शाप-प्रतिशाप का दौर चल रहा था, तो शिवजी बहुत ही उदास हो गए और बिना कुछ बोले अपने शिष्यों के साथ यज्ञस्थल छोड़कर चले गए। |
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