श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  4.2.31 
एष एव हि लोकानां शिव: पन्था: सनातन: ।
यं पूर्वे चानुसन्तस्थुर्यत्प्रमाणं जनार्दन: ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
वेद मानव सभ्यता के कल्याण और प्रगति के शाश्वत नियमों का उपदेश देते हैं जिनका पालन अतीत में सख्ती से किया जाता था। इस सिद्धांत का मजबूत प्रमाण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं, जिन्हें जनार्दन कहा जाता है, अर्थात् सभी जीवों के शुभचिंतक।
 
वेद मानव सभ्यता के कल्याण और प्रगति के शाश्वत नियमों का उपदेश देते हैं जिनका पालन अतीत में सख्ती से किया जाता था। इस सिद्धांत का मजबूत प्रमाण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं, जिन्हें जनार्दन कहा जाता है, अर्थात् सभी जीवों के शुभचिंतक।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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