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श्लोक 4.2.30  |
ब्रह्म च ब्राह्मणांश्चैव यद्यूयं परिनिन्दथ ।
सेतुं विधारणं पुंसामत: पाषण्डमाश्रिता: ॥ ३० ॥ |
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| अनुवाद |
| भृगु मुनि ने आगे कहा : चूंकि तुम वैदिक नियमों का पालन करने वाले ब्राह्मणों और वेदों की निंदा करते हो, इससे पता चलता है कि तुमने नास्तिकता के सिद्धांत को अपनाया है। |
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| भृगु मुनि ने आगे कहा : चूंकि तुम वैदिक नियमों का पालन करने वाले ब्राह्मणों और वेदों की निंदा करते हो, इससे पता चलता है कि तुमने नास्तिकता के सिद्धांत को अपनाया है। |
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