ब्रह्म च ब्राह्मणांश्चैव यद्यूयं परिनिन्दथ ।
सेतुं विधारणं पुंसामत: पाषण्डमाश्रिता: ॥ ३० ॥
अनुवाद
भृगु मुनि ने आगे कहा : चूंकि तुम वैदिक नियमों का पालन करने वाले ब्राह्मणों और वेदों की निंदा करते हो, इससे पता चलता है कि तुमने नास्तिकता के सिद्धांत को अपनाया है।
Bhrigu Muni further said: Since you criticise the Brahmins and the Vedas, who are the followers of the Vedic rules, it shows that you have adopted the policy of atheism.
तात्पर्य
नंदीश्वर को श्राप देते हुए भृगु मुनि ने कहा कि न केवल इस श्राप से तुम नास्तिक होकर नीचा बन जाओगे बल्कि तुम पहले से ही नास्तिकता के स्तर पर गिर चुके हो क्योंकि तुमने वेदों की निंदा की है जो मानव सभ्यता का स्रोत हैं। मानव सभ्यता सामाजिक व्यवस्था के गुणात्मक विभाजन पर आधारित है, अर्थात् बुद्धिमान वर्ग, योद्धा वर्ग, उत्पादक वर्ग और मजदूर वर्ग। वेद आध्यात्मिक साधना और आर्थिक विकास में उन्नति करने और इंद्रियतृप्ति के सिद्धांत को विनियमित करने के लिए सही दिशा प्रदान करते हैं, ताकि अंततः व्यक्ति अपनी वास्तविक आध्यात्मिक पहचान (अहं ब्रह्मास्मि) की भौतिक संदूषण से मुक्त हो सके। जब तक कोई भौतिक अस्तित्व के संदूषण में है, तब तक वह जलीय प्राणियों से लेकर ब्रह्मा की स्थिति तक शरीर बदलता रहता है परन्तु भौतिक संसार में मानव जीवन ही उच्चतम पूर्णता वाला जीवन है। वेद निर्देश देते हैं जिनके द्वारा स्वयं को अगले जन्म में उन्नत किया जा सकता है। वेद ऐसे निर्देशों के लिए माता हैं और ब्राह्मण या वेदों के ज्ञाता व्यक्ति पिता हैं। इस प्रकार यदि कोई वेदों और ब्राह्मणों की निंदा करता है, तो स्वाभाविक रूप से वह नास्तिकता की स्थिति में चला जाता है। संस्कृत में उपयोग किया जाने वाला सटीक शब्द नास्तिक है, जो उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो वेदों में विश्वास नहीं करता है बल्कि धर्म की कुछ मनगढ़ंत प्रणाली बनाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा है कि बौद्ध धर्म पद्धति के अनुयायी नास्तिक हैं। अहिंसा के अपने सिद्धांत को स्थापित करने के लिए, भगवान बुद्ध ने वेदों में विश्वास करने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया और इस प्रकार, बाद में, शंकराचार्य ने भारत में धर्म की इस प्रणाली को बंद कर दिया और उन्हें भारत से बाहर जाने के लिए मजबूर किया। यहाँ यह कहा गया है, ब्रह्म च ब्राह्मणानाम्। ब्रह्म का अर्थ है वेद। अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ है "मैं पूर्ण ज्ञान में हूँ।" वैदिक अभिकथन यह है कि किसी को यह सोचना चाहिए कि वह ब्रह्म है, क्योंकि वास्तव में वह ब्रह्म है। यदि ब्रह्म या वैदिक आध्यात्मिक विज्ञान की निंदा की जाती है, और आध्यात्मिक विज्ञान के स्वामी ब्राह्मणों की निंदा की जाती है, तो मानव सभ्यता कहाँ है? भृगु मुनि ने कहा, "यह मेरे श्राप के कारण नहीं है कि तुम नास्तिक बनोगे; तुम पहले से ही नास्तिकता के सिद्धांत में स्थित हो। इसलिए तुम्हें श्रापित किया जाता है।”
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥