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श्लोक 4.2.25  |
गिर: श्रुताया: पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा ।
मथ्ना चोन्मथितात्मान: सम्मुह्यन्तु हरद्विष: ॥ २५ ॥ |
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| अनुवाद |
| मोहक वैदिक प्रतिज्ञाओं की पुष्पमयी (अलंकृत) भाषा से आकृष्ट होकर जो जड़ बन चुके हैं और शिव-द्रोही हैं, वे सदैव सकाम कर्मों में निरत रहें। ये ईर्ष्यालु लोग शिव की आराधना न करें और सदा सकाम कर्मों में लगे रहें। |
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| मोहक वैदिक प्रतिज्ञाओं की पुष्पमयी (अलंकृत) भाषा से आकृष्ट होकर जो जड़ बन चुके हैं और शिव-द्रोही हैं, वे सदैव सकाम कर्मों में निरत रहें। ये ईर्ष्यालु लोग शिव की आराधना न करें और सदा सकाम कर्मों में लगे रहें। |
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