श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.2.25 
गिर: श्रुताया: पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा ।
मथ्ना चोन्मथितात्मान: सम्मुह्यन्तु हरद्विष: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
मोहक वैदिक प्रतिज्ञाओं की पुष्पमयी (अलंकृत) भाषा से आकृष्ट होकर जो जड़ बन चुके हैं और शिव-द्रोही हैं, वे सदैव सकाम कर्मों में निरत रहें। ये ईर्ष्यालु लोग शिव की आराधना न करें और सदा सकाम कर्मों में लगे रहें।
 
मोहक वैदिक प्रतिज्ञाओं की पुष्पमयी (अलंकृत) भाषा से आकृष्ट होकर जो जड़ बन चुके हैं और शिव-द्रोही हैं, वे सदैव सकाम कर्मों में निरत रहें। ये ईर्ष्यालु लोग शिव की आराधना न करें और सदा सकाम कर्मों में लगे रहें।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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