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श्लोक 4.2.19  |
निषिध्यमान: स सदस्यमुख्यै-
र्दक्षो गिरित्राय विसृज्य शापम् ।
तस्माद्विनिष्क्रम्य विवृद्धमन्यु-
र्जगाम कौरव्य निजं निकेतनम् ॥ १९ ॥ |
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| अनुवाद |
| मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, यज्ञ के सभासदों के बहुत समझाने पर भी दक्ष क्रोध में आकर शिवजी को शाप देते रहे और फिर सभा छोड़कर अपने घर लौट गए। |
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| मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, यज्ञ के सभासदों के बहुत समझाने पर भी दक्ष क्रोध में आकर शिवजी को शाप देते रहे और फिर सभा छोड़कर अपने घर लौट गए। |
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