श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.2.19 
निषिध्यमान: स सदस्यमुख्यै-
र्दक्षो गिरित्राय विसृज्य शापम् ।
तस्माद्विनिष्क्रम्य विवृद्धमन्यु-
र्जगाम कौरव्य निजं निकेतनम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, यज्ञ के सभासदों के बहुत समझाने पर भी दक्ष क्रोध में आकर शिवजी को शाप देते रहे और फिर सभा छोड़कर अपने घर लौट गए।
 
मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, यज्ञ के सभासदों के बहुत समझाने पर भी दक्ष क्रोध में आकर शिवजी को शाप देते रहे और फिर सभा छोड़कर अपने घर लौट गए।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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