श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 2: दक्ष द्वारा शिवजी को शाप  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.2.19 
निषिध्यमान: स सदस्यमुख्यै-
र्दक्षो गिरित्राय विसृज्य शापम् ।
तस्माद्विनिष्क्रम्य विवृद्धमन्यु-
र्जगाम कौरव्य निजं निकेतनम् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
मैत्रेय ने आगे कहा : हे विदुर, यज्ञ के सभासदों के बहुत समझाने पर भी दक्ष क्रोध में आकर शिवजी को शाप देते रहे और फिर सभा छोड़कर अपने घर लौट गए।
 
Maitreya further said: O Vidur, despite being forbidden by the members of the sacrificial assembly, Daksh became angry and kept cursing Lord Shiva and then left the assembly and went to his home.
तात्पर्य
क्रोध इतना विनाशकारी है कि दक्ष जैसे महान व्यक्ति भी क्रोध में आकर उस सभा को छोड़कर चले गये जहाँ ब्रह्मा विराजमान थे और सभी महान ऋषि और पवित्र व संतजन उपस्थित थे। उन सभी ने उनसे न जाने का अनुरोध किया, पर क्रोधित होकर वे ये सोचकर चले गये कि यह शुभ स्थान उनके लिए उपयुक्त नहीं। अपने उच्च पद से घमंड में चूर वे सोचते थे कि तर्क-वितर्क में उनसे बड़ा कोई नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान ब्रह्मा समेत सभी सभा के सदस्यों ने उनसे क्रोध न करने और उनकी संगति न छोड़ने का अनुरोध किया, पर उनके इन सभी अनुरोधों के बावजूद वे चले गये। यह क्रूर क्रोध का प्रभाव है। अतः भगवद्-गीता में सलाह दी जाती है कि जो व्यक्ति आध्यात्मिक चेतना में मूर्त प्रगति करना चाहता है, उसे तीन चीज़ों से बचना चाहिए - वासना, क्रोध और रजोगुण। वास्तव में हम देख सकते हैं कि वासना, क्रोध और रजोगुण व्यक्ति को पागल बना देते हैं, चाहे वह दक्ष जितना भी महान क्यों न हो। दक्ष नाम ही इस बात का संकेत देता है कि वे सभी भौतिक गतिविधियों में निपुण थे, पर फिर भी शिव जैसे एक संत पुरुष के प्रति उनकी घृणा के कारण वे क्रोध, वासना और रजोगुण - इन तीन शत्रुओं से पीड़ित हुए। इसलिए भगवान चैतन्य ने सलाह दी है कि वैष्णवों को ठेस पहुँचाने से अत्यधिक सावधान रहना चाहिए। उन्होंने वैष्णवों के प्रति अपराध की तुलना उन्मादी हाथी से की। जैसे उन्मादी हाथी कुछ भी भयानक कर सकता है, उसी तरह जब कोई व्यक्ति वैष्णव का अपराध करता है तो वह कोई भी घृणित कार्य कर सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)