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श्लोक 4.2.13  |
लुप्तक्रियायाशुचये मानिने भिन्नसेतवे ।
अनिच्छन्नप्यदां बालां शूद्रायेवोशतीं गिरम् ॥ १३ ॥ |
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| अनुवाद |
| इस शिष्टाचार नियमों को तोड़ने वाले व्यक्ति को अपनी कन्या प्रदान करने की मेरी रत्ती भर भी इच्छा नहीं थी। आवश्यक विधियों और नियमों का पालन न करने के कारण यह अशुद्ध है, किन्तु इसे अपनी कन्या प्रदान करने के लिए मैं उसी प्रकार बाध्य हो गया जिस प्रकार किसी शूद्र को वेदों का पाठ पढ़ाना पड़े। |
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| इस शिष्टाचार नियमों को तोड़ने वाले व्यक्ति को अपनी कन्या प्रदान करने की मेरी रत्ती भर भी इच्छा नहीं थी। आवश्यक विधियों और नियमों का पालन न करने के कारण यह अशुद्ध है, किन्तु इसे अपनी कन्या प्रदान करने के लिए मैं उसी प्रकार बाध्य हो गया जिस प्रकार किसी शूद्र को वेदों का पाठ पढ़ाना पड़े। |
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