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श्लोक 4.2.12  |
गृहीत्वा मृगशावाक्ष्या: पाणिं मर्कटलोचन: ।
प्रत्युत्थानाभिवादार्हे वाचाप्यकृत नोचितम् ॥ १२ ॥ |
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| अनुवाद |
| इसकी आँखें बन्दर जैसी हैं, फिर भी इसने हिरणी की तरह सुन्दर आँखों वाली मेरी बेटी से विवाह किया है। फिर भी इसने उठकर न तो मेरा स्वागत किया और न ही मीठी वाणी से मेरा आदर-सत्कार करना उचित समझा। |
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| इसकी आँखें बन्दर जैसी हैं, फिर भी इसने हिरणी की तरह सुन्दर आँखों वाली मेरी बेटी से विवाह किया है। फिर भी इसने उठकर न तो मेरा स्वागत किया और न ही मीठी वाणी से मेरा आदर-सत्कार करना उचित समझा। |
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