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श्लोक 4.2.11  |
एष मे शिष्यतां प्राप्तो यन्मे दुहितुरग्रहीत् ।
पाणिं विप्राग्निमुखत: सावित्र्या इव साधुवत् ॥ ११ ॥ |
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| अनुवाद |
| इसने पहले ही अग्नि एवं ब्राह्मणों की मौजूदगी में मेरी पुत्री से विवाह करके मेरी अधीनता स्वीकार कर ली है। गायत्री के समान मेरी पुत्री से विवाह करके इसने अपने आप को एक ईमानदार व्यक्ति होने का ढोंग रचा है। |
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| इसने पहले ही अग्नि एवं ब्राह्मणों की मौजूदगी में मेरी पुत्री से विवाह करके मेरी अधीनता स्वीकार कर ली है। गायत्री के समान मेरी पुत्री से विवाह करके इसने अपने आप को एक ईमानदार व्यक्ति होने का ढोंग रचा है। |
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