स त्वं विमृश्यास्य भवं प्रजापते
सङ्कल्पनं विश्वसृजां पिपीपृहि ।
ऐन्द्रीं च मायामुपधर्ममातरं
प्रचण्डपाखण्डपथं प्रभो जहि ॥ ३८ ॥
अनुवाद
हे प्रजा-पालक, भगवान विष्णु द्वारा प्रदत्त अपने अवतार के पीछे के उद्देश्य पर विचार करें। इंद्र द्वारा निर्मित अधार्मिक सिद्धांत असंख्य अवांछित धर्मों की जड़ हैं। इसलिए तुरंत इन पाखंडों का अंत कर दें।
O protector of the people, please ponder over the purpose of this incarnation given to you by Vishnu. The irreligion created by Indra is the mother of many unwanted dharmas. Therefore, please put an end to these hypocrisies immediately.
तात्पर्य
भगवान ब्रह्मा ने राजा पृथु को प्रजापति कहकर केवल उन्हें नागरिकों की शांति और समृद्धि बनाए रखने की उनकी बड़ी ज़िम्मेदारी की याद दिलाने के लिए ही संबोधित किया। महाराज पृथु को केवल इसी उद्देश्य के लिए भगवान द्वारा सशक्त बनाया गया था। आदर्श राजा का कर्तव्य यह देखना है कि लोग धार्मिक सिद्धांतों का ठीक से पालन कर रहे हैं। भगवान ब्रह्मा ने विशेष रूप से राजा पृथु से राजा इंद्र द्वारा निर्मित छद्म धार्मिक सिद्धांतों पर विजय पाने का अनुरोध किया। दूसरे शब्दों में, धूर्त व्यक्तियों द्वारा प्रस्तुत छद्म धार्मिक व्यवस्थाओं को रोकना राज्य या राजा का कर्तव्य है। मूल रूप से एक धार्मिक सिद्धांत होता है, जिसे भगवान द्वारा दिया जाता है, और यह दो रूपों में शिष्य उत्तराधिकार की श्रृंखला के माध्यम से आता है। भगवान ब्रह्मा ने पृथु महाराज से इंद्र के साथ अपनी अनावश्यक प्रतिस्पर्धा से दूर रहने का अनुरोध किया था, जो पृथु महाराज को एक सौ यज्ञ पूरे करने से रोकने के लिए दृढ़ था। प्रतिकूल प्रतिक्रियाएँ पैदा करने के बजाय, महाराज पृथु के लिए एक अवतार के रूप में अपने मूल उद्देश्य के हित में यज्ञों को रोकना बेहतर था। यह उद्देश्य अच्छी सरकार स्थापित करना और चीजों को सही क्रम में स्थापित करना था।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥