श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 19: राजा पृथु के एक सौ अश्वमेध यज्ञ  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  4.19.37 
भवान् परित्रातुमिहावतीर्णो
धर्मं जनानां समयानुरूपम् ।
वेनापचारादवलुप्तमद्य
तद्देहतो विष्णुकलासि वैन्य ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
हे वेन-पुत्र राजा पृथु, आप भगवान विष्णु के अंश हैं। राजा वेन के दुष्ट कामों के कारण धर्म लगभग समाप्त हो चुका था। ऐसे समय में आप भगवान विष्णु के रूप में अवतरित हुए। निस्संदेह, आप धर्म की रक्षा के लिए ही राजा वेन के शरीर से प्रकट हुए हैं।
 
O King Prithu, son of Vena, you are a part of Lord Viṣṇu. Dharma had almost disappeared due to the mischievous activities of King Vena. At the right time, you incarnated as Lord Viṣṇu. Indeed, you have appeared from the body of King Vena only to protect Dharma.
तात्पर्य
भगवान विष्णु जिस तरह राक्षसों का वध करते हैं और भक्तों की रक्षा करते हैं, इसका उल्लेख भगवद्गीता (4.8) में किया गया है:

परित्राणाय साधूनां

विनाशाय च दुष्कृताम्

धर्म-संस्थापनार्थाय

सम्भवामी युगे युगे

"धर्म की स्थापना करने, पापियों का नाश करने और भक्तों की रक्षा करने के लिए मैं युगों-युगों में प्रकट होता हूँ।"

भगवान विष्णु हमेशा एक हाथ में गदा और एक हाथ में चक्र रखते हैं ताकि राक्षसों का वध कर सकें, और अपने दूसरे दोनों हाथों में वे अपने भक्तों की रक्षा के लिए शंख और कमल धारण करते हैं। जब उनका अवतार इस ग्रह या ब्रह्मांड में उपस्थित होता है, तो भगवान एक साथ राक्षसों का वध करते हैं और अपने भक्तों की रक्षा करते हैं। कभी-कभी भगवान विष्णु स्वयं भगवान कृष्ण या भगवान राम के रूप में प्रकट होते हैं। इन सभी अवतारों का उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। कभी-कभी वे शक्त्यावेश-अवतार के रूप में प्रकट होते हैं जैसे भगवान बुद्ध। जैसा कि पहले बताया गया है, ये शक्त्यावेश-अवतार एक जीव में निहित विष्णु की शक्ति के अवतार हैं। जीव भी भगवान विष्णु के ही अंश हैं, लेकिन वे उतने शक्तिशाली नहीं होते; इसलिए जब कोई जीव विष्णु के अवतार के रूप में अवतरित होता है, तो उसे भगवान द्वारा विशेष रूप से सशक्त किया जाता है।

जब राजा पृथु को भगवान विष्णु का अवतार बताया जाता है, तो यह समझ लेना चाहिए कि वह एक शक्त्यावेश-अवतार हैं, भगवान विष्णु के अंश हैं, और उन्हें विशेष रूप से उनके द्वारा सशक्त किया गया है। इस प्रकार भगवान विष्णु का अवतार बनकर कार्य करने वाला कोई भी जीव भक्तिपंथ का प्रचार करने के लिए भगवान विष्णु द्वारा सशक्त होता है। ऐसा व्यक्ति भगवान विष्णु की तरह कार्य कर सकता है और राक्षसों को तर्कों से परास्त कर सकता है और शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार भक्ति पंथ का प्रचार कर सकता है। जैसा कि भगवद्गीता में बताया गया है, जब भी हम किसी असाधारण व्यक्ति को भक्ति पंथ का प्रचार करते पाते हैं, तो हमें यह जान लेना चाहिए कि उसे भगवान विष्णु, या भगवान कृष्ण द्वारा विशेष रूप से सशक्त किया गया है। जैसा कि चैतन्य-चरितामृत (अंत्य 7.11) में पुष्टि की गई है: कृष्ण-शक्ति बिना नाहे तारा प्रवर्तन: भगवान के पवित्र नाम की महिमा का वर्णन कोई भी उनके द्वारा विशेष रूप से सशक्त किए बिना नहीं कर सकता। यदि कोई ऐसे सशक्त व्यक्तित्व की आलोचना करता है या उसमें दोष ढूंढता है, तो उसे भगवान विष्णु के खिलाफ अपराधी माना जाएगा और दंडनीय होगा। भले ही ऐसे अपराधी वैष्णवों की तरह झूठे तिलक और माला पहनकर रहें, लेकिन अगर वे किसी शुद्ध वैष्णव का अपमान करते हैं तो भगवान उन्हें कभी माफ नहीं करते। शास्त्रों में इसके कई उदाहरण हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)